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गुरुवार, 8 जुलाई 2010

"पंक में खिला कमल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


पंक में खिला कमल,
किन्तु है अमल-धवल!
बादलों की ओट में से,
चाँद झाँकता नवल!!


डण्ठलों के साथ-साथ,
तैरते हैं पात-पात,
रश्मियाँ सँवारतीं ,
प्रसून का सुवर्ण-गात,
देखकर अनूप-रूप को,
गया हृदय मचल! 
बादलों की ओट में से,
चाँद झाँकता नवल!! 


पंक के सुमन में ही, 
सरस्वती विराजती,
श्वेत कमल पुष्प को,
ही शारदे निहारती,
पूजता रहूँगा मैं,
सदा-सदा चरण-कमल!
बादलों की ओट में से,
चाँद झाँकता नवल!! 

19 टिप्‍पणियां:

  1. पंक के सुमन में ही,
    सरस्वती विराजती,
    श्वेत कमल पुष्प को,
    ही शारदे निहारती,
    पूजता रहूँगा मैं,
    सदा-सदा चरण-कमल!
    बादलों की ओट में से,
    चाँद झाँकता नवल!! .......bahut sundar kavita.badhaai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय मयंक जी !

    अब तो आपसे ईर्ष्या होने लगी है.............

    बहुत ख़ूब.........वाह ! क्या बात है

    उत्तर देंहटाएं
  3. परम आदरणीय चचा शास्त्री जी
    सरस्वती की असीम कृपा है आप पर !
    यह गीत तो बहुत ही मनभावन लिखा आपने ।

    अब कोहनी वगैरह का ध्यान रखना।

    …और हां , चाचीजी से कह कर नज़र ज़रूर उतरवालें , अपनी भी और आपकी लेखनी की भी ।
    शुभकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह जी वाह्………………अति उत्तम रचना है……………गज़ब की प्रस्तुति है……………पढकर दिल खुश हो गया।

    उत्तर देंहटाएं
  5. हर रोज कहां से लायें नये शब्द आपकी रचना की तारीफ के लिये.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आप की रचना 9 जुलाई के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com
    आभार
    अनामिका

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही सुंदर जी आज तो मन मोह लिया. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. पंक के सुमन में ही,
    सरस्वती विराजती,
    श्वेत कमल पुष्प को,
    ही शारदे निहारती,
    पूजता रहूँगा मैं,
    सदा-सदा चरण-कमल!
    बादलों की ओट में से,
    चाँद झाँकता नवल

    बहुत उम्दा रचना..!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. श्वेत कमल पुष्प को,
    ही शारदे निहारती,
    पूजता रहूँगा मैं,
    सदा-सदा चरण-कमल!
    बहुत सुन्दर माँ शार्दे तो आपकी कलम मे रहती हैं। सुन्दर कविता बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  10. जितना सुन्दर कमल उतनी ही सुन्दर कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  11. पंक के सुमन में ही,
    सरस्वती विराजती,
    श्वेत कमल पुष्प को,
    ही शारदे निहारती,
    पूजता रहूँगा मैं,
    सदा-सदा चरण-कमल!

    शास्त्री जी ,
    आपको माँ शारदा का वरदान मिला हुआ है...बहुत मनभावन रचना..जितनी बार भी पढ़ी जाये कम है...काश कभी यह रचना कक्षा ६ - ७ के बच्चों को पढाई जाये....यह मेरी हार्दिक अभिलाषा है...

    उत्तर देंहटाएं
  12. You have a very good blog that the main thing a lot of interesting and beautiful! hope u go for this website to increase visitor.

    उत्तर देंहटाएं
  13. पंक में भी खिलकर कमल कितनी सुन्दरता बिखेर देता है ..

    सुन्दर कविता ..!

    उत्तर देंहटाएं
  14. नत मस्तक आपके शब्द कौशल व धाराप्रवाहिता पर ।

    उत्तर देंहटाएं

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