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शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

“इस रचना का किसी से भी सम्बन्ध नही है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“कोरा हास्य”

मुझसे बतियाने को कोई,
चेली बन जाया करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!


जान और पहचान नही है,
देश-वेश का ज्ञान नही है,
टूटी-फूटी रोमन-हिन्दी,
हमें चिढ़ाया सा करती है!


तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!


कोई बिटिया बन जाती है,
कोई भगिनी बन जाती है,
कोई-कोई तो बुड्ढे की,
साली कहलाया करती है!


तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!


आँख लगी तो सपना आया,
आँख खुली तो मैंने पाया,
बिन सिर पैरों की लिखने से,
सैंडिल पड़ जाया करती हैं!


तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!


जाल-जगत की महिमा न्यारी,
वाह-वाही लगती है प्यारी,
अपनी करो प्रशंसा जमकर,
श्लाघा मन-भाया करती है!


तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

25 टिप्‍पणियां:

  1. आँख लगी तो सपना आया,
    आँख खुली तो मैंने पाया,
    बिन सिर पैरों की लिखने से,
    सैंडिल पड़ जाया करती हैं!

    हा हा हा………………लगता है मौसम का असर हो गया है आप पर भी…………………बच के रहियेगा कहीं सपना सच ना हो जाये।

    उत्तर देंहटाएं
  2. हा हा!! हँसने वाली तो बात भी हैं सारी. :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. अजी शास्त्री जी आप तो ऎसे न थे :)
    हा हा हा.. हास्य से भरपूर बहुत बढिया रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  4. ये तो कमाल का चिंतन है।
    आजकल जो हो रहा है उसे ही समेट लिया है आपने।
    हम तो इसे गंभीरता से ले रहे हैं।
    जान और पहचान नही है,
    देश-वेश का ज्ञान नही है,
    टूटी-फूटी रोमन-हिन्दी,
    हमें चिढ़ाया सा करती है!


    तब मुझको बातों-बातों में,
    हँसी बहुत आया करती है!
    चैट तो करेंगे नहीं और करेंगे भी तो बस देवनागरी में। और दुरुस्त हिन्दी में।

    उत्तर देंहटाएं
  5. हा हा हा वाह भाई साहिब क्या खूब रचना है। बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. namskar ji parhkar bahut maja aaya
    arganikbhagyoday.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  7. तब मुझको बातों-बातों में,
    हँसी बहुत आया करती है!
    वाह !! वाह !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. sathe pe patha badhai ho aisi hee kavitayne likhte rahen santosh ke liye, jvani ke din jo dhal chuke hain

    उत्तर देंहटाएं
  9. साहब ! और किसी से कोई संबंध हो या न हो किन्तु जो जैसा देखना चाहे अपनी प्रतिच्छाया देखनो स्वतंत्र है!
    बाकी बढ़्या हास्य !
    निर्मल हास्य!!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    10.07.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल करने के लिए इसका लिंक लिया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  11. तजुर्बे की बात है
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  12. अपनी करो प्रशंसा जमकर,
    श्लाघा मन-भाया करती है!

    येल्‍लो !! इतनी अच्‍छी कविता और पाठक वाह, वाह! ना कहें ऐसा नहीं हो सकता शास्‍त्री जी.

    यह कविता सभी से संबंधित है.


    धन्‍यवाद. :)

    उत्तर देंहटाएं
  13. अरे आप तो अच्छा हास्य भी लिखते हैं
    पढ़कर मुस्कान तैर गई है
    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  14. बिन सिर पैरों की लिखने से,
    सैंडिल पड़ जाया करती हैं!

    :):)

    उत्तर देंहटाएं
  15. a useless composition of words which all our saying poem my god what a misuse of blog

    उत्तर देंहटाएं
  16. आज तो बिलकुल नया रंग है इस कविता में...मज़ा आ गया.....

    उत्तर देंहटाएं

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