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गुरुवार, 5 अगस्त 2010

“अपना-अपना भाग्य” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


खिल रहे हैं चमन में हजारों सुमन,
भाग्य कब जाने किस का बदल जायेगा! 

कोई श्रृंगार देवों का  बन जायेगा,

कोई जाकर के माटी में मिल जायेगा!! 

कोई यौवन में  भरकर हँसेगा कहीं,
कोई खिलने से पहले ही ढल जायेगा! 

कोई अर्थी पे होगा सुशोभित कहीं,
कोई पूजा की थाली में इठलायेगा!  

हार पुष्पांजलि का बनेगा  कोई,
कोई  जूड़े में गोरी के गुँथ जायेगा!

14 टिप्‍पणियां:

  1. ख़ूबसूरत गुलाब के फूलों के साथ साथ रचना भी बेहद ख़ूबसूरत है! उम्दा रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  2. उगते तो एक ही बगिया में, जाना अलग अलग होता है। सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप की रचना 06 अगस्त, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्दर गीत , गाने में तो और भी मधुर बन पड़ा है ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. यही तो फूल की किस्मत है मगर वो तब भी कितना खुश है और उसी का जीवन छोटा होते हुये भी सार्थक है……………एक बहुत ही सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  6. कोई अर्थी पे होगा सुशोभित कहीं,
    कोई पूजा की थाली में इठलायेगा!
    जीवन का यथार्थ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी रचना पढ़ कर माखनलाल चतुर्वेदी की कविता याद आ गयी...

    चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं
    ...

    बहुत सुन्दर अभ्व्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर फूल, सुन्दर भावाभिव्यक्ति और सुन्दर शब्द संयोजन ! आपके सूक्ष्म सौंदर्य बोध के लिये आपको बधाई एवं इतनी खूबसूरत रचना के लिये आपका आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  9. Sir...AAp to hamehsa hi itna badiya likhte hain..ki padhne vaala bas padhta hi rah jaaye.


    Ye rachna bhi bahut hi achhi hai.

    उत्तर देंहटाएं

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