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रविवार, 8 अगस्त 2010

“हमको आपने भारत पे नाज़ है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

धर्मनिरपेक्ष राज-काज है।
जनता का जनता पे राज है।
हमको अपने भारत पे नाज़ है।।


नीलकण्ठ गंगा सवाँरता,
चरणों को सागर पखारता,
सिर पर हिमालय का ताज है।
हमको अपने भारत पे नाज़ है।।


मस्जिद में गूँजती अजान हैं,
मन्दिरों में राम और श्याम हैं,
एकता परोसता समाज है।
हमको अपने भारत पे नाज़ है।।


पूजनीय लाल, बाल, पाल हैं,
वन्दनीय माता के लाल हैं,
जिन्होंने बचाई माँ की लाज है।
हमको अपने भारत पे नाज़ है।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत भावपूर्ण रचना ....आपकी रचना में लाल , बाल , पाल को एक साथ याद किया गया ....बहुत अच्छा लगा ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहद भावपूर्ण और प्रेरक रचना।
    अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
    कल (9/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
    और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर शास्त्री जी , क्षमा करे, वैसे आप जैसे साहित्य पुरुष को कोई साहित्यिक सजेशन देने की मेरी क्या औकात फिर भी अगर आपको ठीक लगे तो " मंदिरों में राम और श्याम की जगह भगवान् कर दे तो छंद और निखरेगा ऐसा मेरा मानना है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. हमें भी बहुत नाज़ है देश पर। बहुत सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  5. “हमको आपने भारत पे नाज़ है|”

    एक बेहद उम्दा और सार्थक रचना पर बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  6. हमें नाज़ तो करना चाहिए भारत पर ...
    अच्छी कविता ..!

    उत्तर देंहटाएं
  7. भारत पे नाज है...सन्देश भी, कविता भी..बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  8. हमे भी अपने भारत पर नाज़ है। बहुत अच्छी लगी रचना। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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