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बुधवार, 25 अगस्त 2010

"अतिवृष्टि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

अतिवृष्टि


जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।
बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।
दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।
गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।
बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

22 टिप्‍पणियां:

  1. मुसलाधार बारीश होने के वजह से बहुत ही बुरा हाल है! क्या अभी भी बारीश हो रही है? सभी लोगों को परेशानी हो रही है और मुश्क़िलों का सामना करना पड़ रहा है बहुत अच्छी तरह से समझ सकती हूँ! उम्मीद है ये बारीश जल्द ही रूक जाएगी!

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  2. ativrishti ....anavrishti :-
    dono hi paristhitiyan vikat hoti hain!!!
    iswar kripa se sabkuch samanya ho ...jahaan baarish aanandmayi ho na ki vinashpurna!

    subhkamnayen:)

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही लिखी है रचना.सच मे बारिश कहर बरपा रही है...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी कविता।
    :: हंसना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बाढ़ का चित्र अच्छा खींचा है ...सुन्दर प्रस्तुति ..

    उत्तर देंहटाएं
  6. bahut achcha likha hai shastri ji.really kal hi maine ganga river ka bhi rodra roop first time dekha.lagta hai sach me prakrati roothi hui hai.

    उत्तर देंहटाएं
  7. शास्त्री जी, होने दो बारिश।
    यह मौका हर बार नहीं मिलता। क्या पता अगली बार सूखा ही पड जाये।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आदरणीय शास्त्रीजी
    प्रणाम !
    कोई विषय हो ,किसी छंद में लिखना हो , हमारे प्यारे विद्वान शास्त्री चाचा के लिए एकदम सरल और सहज है ।
    बारिश से सबके मन ऊबे,
    धानों के बिरुए सब डूबे,
    अब तो थम जाओ महारानी।
    घर में पानी, बाहर पानी।।

    क्या स्थिति चित्रण है , और कितने प्यारे अंदाज़ में लगातार बरस रही बरखा रानी से अनुनय - विनय है !
    …अब तो थम जाओ महारानी !

    गैस बिना चूल्हा है सूना,
    दूध बिना रोता है मुन्ना,
    भूखी हैं दादी और नानी।
    घर में पानी, बाहर पानी।।

    शब्द शब्द के साथ नमन है शास्त्र्री जी !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  9. जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
    तब रूठी थी बरखा-रानी।
    अब बरसी तो इतनी बरसी,
    घर में पानी, बाहर पानी।।
    ......bahut sundar shastriji....a real piece of poetri.

    उत्तर देंहटाएं
  10. अति सबकी बुरी है ..अच्छा चित्र खींचा है .

    उत्तर देंहटाएं
  11. कविता के माध्यम से बाढ़ का वर्णन अच्छा लगा लेकिन इस पानी से कितना नुकसान होगा यह सोच कर डर लगता है अच्छी रचना के लिए बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत ही सुंदर कविता रची आपने, पर हमारे यहां तो सौ ग्राम पानी भी नही बरसा अभी तक, और आपके यहां तनों से बरस रहा है.:)

    रामराम.

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  13. गीत सुन्दर है किन्तु मध्य प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा अभी भी पानी को तरस रहा है.

    उत्तर देंहटाएं
  14. गीत सुन्दर है किन्तु मध्य प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा अभी भी पानी को तरस रहा है.

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत सुंदर कविता लिखी आप ने, बारिश तो हर साल आती है, गलतिया हम ने की है, विकास के साथ साथ दिमाग भी लगाये कि जब बारिस होगी तो उस का पानी भी किस तरफ़ निकलेगा, शायद सरकार ने इस बारे कभी सोचा ही नही, ओर जब निकासी ही नही होगी तो, पानी तो जमा होगा, ओर आम जनता भी तंग होगी, यानि हम ने आज तक कोई विकास नही किया, सब कुछ पहले जेसा ही नही उस से भी बेकार हो गया है

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  16. चित्रों के साथ सजीव वर्णन किया है ... बहुत सुंदर रचना है ....

    उत्तर देंहटाएं
  17. बारिश से सबके मन ऊबे,
    धानों के बिरुए सब डूबे,
    अब तो थम जाओ महारानी।
    घर में पानी, बाहर पानी।।
    एकदम सही चित्रण । गलती तो हमारी है । समय रहते गर्मी में जब पतली सी नदियाँ होती हैं हम उनकी मिट्टी हटा कर गहराई बढायें तो बाढ न आये और पानी भी रहे नदी में, पर नदियां तो हमारी सीवर लाइन बन गई हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  18. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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  19. ये पानी की अति, प्रकृति का कहर - सब कुछ तहस नहस करके रख दिया है. उसमें दूब कर जो अपने लिखा वाकई हर मन की वाणी है

    उत्तर देंहटाएं
  20. अत्याधिक बारिश के इस मौसम से उत्पन्न स्थिति का प्रभावी काव्य चित्रण किया है आपने.

    उत्तर देंहटाएं

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