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बुधवार, 18 अगस्त 2010

"मेरे दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मन है मन्दिर ईश का, रहते हैं भगवान।
कण-कण में जो रम रहा, वो ही तो है राम।।

मन की और मस्तिष्क की,गाथा बहुत विचित्र।
मस्तक करता है मनन, मन का भिन्न चरित्र।।


जिनको फूलों ने दिये, जख्म हजारों बार।
काँटों पर उनको भला, कैसे हो एतबार।।

अपने भारत देश में, भाँति-भाँति के लोग।
कुछ अपनाते योग को, कुछ अपनाते भोग।।

झूठे आँसू आँख से, बहा रहे घड़ियाल।
नेता माला-माल हैं, जनता है कंगाल।।

सीधे-सादे जीव का, चारा ही था घास।
नेता इनको चरे गये, गदहे भये उदास।।


जिनके बँगलों में रहें, सुन्दर-सुन्दर श्वान।
उनको कैसे भायेंगे, निर्धन,श्रमिक,किसान।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. अपने भारत देश में, भाँति-भाँति के लोग।
    कुछ अपनाते योग को, कुछ अपनाते भोग।
    बिल्कुल सही कहा है आपने! बहुत सुन्दर और शानदार दोहे प्रस्तुत किया है आपने!

    उत्तर देंहटाएं
  2. शास्त्री जी, अति सुंदर,धन्यवाद|

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  3. बड़े सुन्दर और सारगर्भित दोहे।

    उत्तर देंहटाएं
  4. mere dohe....ek se badhker ek.prashansa ke liye shabd kum hain.

    उत्तर देंहटाएं
  5. नमस्कार,

    हिन्दी ब्लॉगिंग के पास आज सब कुछ है, केवल एक कमी है, Erotica (काम साहित्य) का कोई ब्लॉग नहीं है, अपनी सीमित योग्यता से इस कमी को दूर करने का क्षुद्र प्रयास किया है मैंने, अपने ब्लॉग बस काम ही काम... Erotica in Hindi. के माध्यम से।

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    टिल्लू की मम्मी

    टिल्लू की मम्मी -२

    उत्तर देंहटाएं
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  7. वाह शास्त्री जी आप ने दोहे के रुप मै आज के भारत काचित्र ही खींच दिया. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. जिनको फूलों ने दिये, जख्म हजारों बार।
    काँटों पर उनको भला, कैसे हो एतबार।।
    बहुत सुन्दर.

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत ही सुन्दर दोहे………………सभी रंग संजोये हुये।

    उत्तर देंहटाएं
  10. अंतिम दोहा बहुत अच्छा लगा ..सारे दोहे सटीक हैं ..

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