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गुरुवार, 26 अगस्त 2010

“मेरा बचपन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

जब से उम्र हुई है पचपन। 
फिर से आया मेरा बचपन।।

पोती-पोतों की फुलवारी,
महक रही है क्यारी-क्यारी,
भरा हुआ कितना अपनापन।
फिर से आया मेरा बचपन।।
इन्हें मनाना अच्छा लगता, 
कथा सुनाना अच्छा लगता,
भोला-भाला है इनका मन।
फिर से आया मेरा बचपन।। 

मुन्नी तुतले बोल सुनाती,
मिश्री कानों में घुल जाती,
चहक रहा जीवन का उपवन।
फिर से आया मेरा बचपन।।
बादल जब जल को बरसाता,
गलियों में पानी भर जाता,
गीला सा हो जाता आँगन।
फिर से आया मेरा बचपन।।
कागज की नौका बन जाती,
कभी डूबती और उतराती,
ढलता जाता यों ही जीवन।
फिर से आया मेरा बचपन।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर तस्वीरों के साथ उम्दा रचना प्रस्तुत किया है आपने! शानदार लगा!

    उत्तर देंहटाएं
  2. पोती-पोतों की फुलवारी,
    महक रही है क्यारी-क्यारी,
    भरा हुआ कितना अपनापन।
    फिर से आया मेरा बचपन।। ....शानदार

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही कहा शास्त्री जी , बुढापे में अपने अतीत में झाँकने का मौक़ा पोते-पोतियों संग मिल जाता है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहद उम्दा रचना .........यह फुलवारी यूँ ही महकती रहे ! बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्री जी
    आज टिप्पणी में सिर्फ इतना ही
    ईश्वर आपको हमेशा स्वस्थ व प्रसन्न रखें

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच ही कहा है जैसे जैसे उम्र बढती है और नन्हे बच्चों का साथ होता है तो बचपन तो अपने आप ही आ जाता है ...सुन्दर चित्रों से सजी सुन्दर रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. आप की रचना 27 अगस्त, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

    उत्तर देंहटाएं
  8. बिल्कुल सही कहा आपने..ऐसे ही लौटता है बचपन..नाती पोतों के साथ.

    उत्तर देंहटाएं
  9. बच्चों के साथ अपना बचपन भी लौट आता है ...
    अच्छी कविता ..!

    उत्तर देंहटाएं
  10. mera bachpan ...behad pyaari kavita.kuch yese hi bhav apne bhi hain.

    उत्तर देंहटाएं

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