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रविवार, 29 अगस्त 2010

"करते-करते यजन, हाथ जलने लगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

करते-करते भजन, स्वार्थ छलने लगे।
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।। 


झूमती घाटियों में, हवा बे-रहम,
घूमती वादियों में, हया  बे-शरम,
शीत में है तपन, हिम पिघलने लगे।
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।। 


उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे,
फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे,
गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे।
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।। 


हो रहा हर जगह, धन से धन का मिलन,
रो रहा हर जगह, भाई-चारा अमन, 
नाम है आचमन, जाम ढलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।। 

23 टिप्‍पणियां:

  1. उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे,
    फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे,
    गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे।
    करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।


    यही तो मुश्किल है…………………

    दाता ने बनाया इंसान
    उसने बना दिया
    स्वार्थमय संसार
    अब हाथ जलें
    या इंसान
    सिर्फ़ धन-भजन
    होना चाहिये

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह शास्त्री जी! बेहद कमाल की रचना है...
    आभार्!

    उत्तर देंहटाएं
  3. हो रहा हर जगह, धन से धन का मिलन,
    रो रहा हर जगह, भाई-चारा अमन,
    नाम है आचमन, जाम ढलने लगे।
    करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।

    आपकी यह रचना बहुत अच्छी लगी ...सच ही आज हवन करते हुए हाथ जल जाते हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति के प्रति मेरे भावों का समन्वय
    कल (30/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
    और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्या करें,
    मेरे ही घर में साँप अब पलने लगे।

    उत्तर देंहटाएं
  6. हो रहा हर जगह, धन से धन का मिलन,
    रो रहा हर जगह, भाई-चारा अमन,
    नाम है आचमन, जाम ढलने लगे।
    करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।

    यथार्थ का चित्रण करती बहुत सुंदर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  7. jnaab aapke hath jne ki khbr ne hmen jhkjhor diyaa hvn krte vqt jo hath jlte hen use shubh bhi to khte hen or yeh chubhn yeh jln yeh andaz yeh alfaaz or likhne ka triqaa to b aapko maashaa allah khne ko ji chaahta he. dil chahta he ke apko brnol,boopls donon bhej dun mzaaq he krpyaa anythaa naa len bura lge to maf kr den. akhtar khan akela kota rajsthan

    उत्तर देंहटाएं
  8. उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे,
    फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे,
    गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे।
    करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।
    कहते हैं जब संसार प्रचण्‍ड तूफान का रूप धारण कर ले, तब सर्वोत्‍तम आश्रय स्‍थल ईश्‍वर की गोद ही है। पर जब यज्ञ करते ही हाथ जले तो उसे कौन बचाए!

    उत्तर देंहटाएं
  9. शास्त्रीजी,
    बहुत मसरूफ और प्रवास में रहा, कल ही दिल्ली लौटा हूँ ! ये बंदिशें पढ़ीं ! शूलों की चुभन और फिर हाथों की जलन मेरे दिल के छालों पर भी चन्दन के लेप-सी लगी मुझे !
    सप्रणाम--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  10. दुनिया को समझाना बहुत मुश्किल है...
    आप अपना कर्म करते जाओ
    हवाओं का तो है ये चलन..

    बहुत अच्छी रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह शास्त्री जी, बहुत उम्दा सृजन!

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति के साथ.... मनभावन पोस्ट...

    उत्तर देंहटाएं
  13. गहरे भाव समेटती हुई रचना है.

    उत्तर देंहटाएं
  14. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

    उत्तर देंहटाएं
  15. उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे,
    फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे,
    गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे।
    करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।। ...खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  16. हो रहा हर जगह, धन से धन का मिलन,
    रो रहा हर जगह, भाई-चारा अमन,
    नाम है आचमन, जाम ढलने लगे।
    करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।

    वाह शास्त्री जी वाह !

    उत्तर देंहटाएं
  17. उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे,
    फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे,
    गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे ..

    असली कर्म तो यही है शास्त्री जी .... बहुत अच्छा लिखा है ....

    उत्तर देंहटाएं
  18. "हो रहा हर जगह -------हाथ जलने लगे "
    बहुत सुंदर भाव लिए रचना |बधाई
    आशा

    उत्तर देंहटाएं

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