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सोमवार, 30 अगस्त 2010

"स्वतन्त्रता का नारा है बेकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जिस उपवन में पढ़े-लिखे हों रोजी को लाचार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

जिनके बंगलों के ऊपर, 
बेखौफ ध्वजा लहराती,
रैन-दिवस चरणों को जिनके,
निर्धन सुता दबाती,
जिस आँगन में खुलकर होता सत्ता का व्यापार। 
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

मुस्टण्डों को दूध-मखाने,
बालक भूखों मरते,
जोशी, मुल्ला, पीर, नजूमी,
दौलत से घर भरते,
भोग रहे सुख आजादी का, बेईमान मक्कार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

गूँज रहीं हैं द्वारे-द्वारे,
बेटों की किलकारी,
सूखी रोटी खाकर पलतीं,
ललनाएँ बेचारी,
भेद-भाव बेटा-बेटी में, भेद भरा है प्यार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. मुस्टण्डों को दूध-मखाने,
    बालक भूखों मरते,
    जोशी, मुल्ला, पीर, नजूमी,
    दौलत से घर भरते,
    भोग रहे सुख आजादी का, बेईमान मक्कार।
    उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।
    बिल्कुल सही कहा है आपने! बहुत सुन्दर और सठिक पंक्तियाँ! शानदार रचना प्रस्तुत किया है आपने!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज के समय डेश और समाज कि जो स्थिति है उस पर आपकी सोच सटीक है ...

    आपकी रचना कल के साप्ताहिक काव्य मंच पर है ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. अति सुंदर रचना जी धन्यवाद,
    सहमत हे जी

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच्चाई से परिपूर्ण ये रचना बहुत अच्छी लगी.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बिन इन सबके स्वातन्त्र्य बेकार है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. मुझे आपकी इस कविता मे‍ बिलकुल बाबा नागार्जुन वाला तेवर दिखा है ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. भोग रहे सुख आजादी का, बेईमान मक्कार।
    उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

    सही कहा शास्त्री जी ये स्वतंत्रता के लायक ही नहीं !

    उत्तर देंहटाएं
  8. स्वतन्त्रता का नारा है बेकार---------बिल्कुल सही कहा………कहाँ की स्वतंत्रता ? अभी तक पुरानी मान्यताओ को पकडे खडे हैं त फिर कैसी स्वतंत्रता।

    उत्तर देंहटाएं

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