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गुरुवार, 19 अगस्त 2010

“देश की स्वतन्त्रता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

खल रही विदेश को, देश की स्वतन्त्रता।
छल रही है देश को,  देश की स्वतन्त्रता।।

खा रहे हैं देश की, गा रहे विदेश की,
खिल्लियाँ उड़ा रहे हैं, भारतीय वेश की,
संभल रही है दासता, पिघल रही स्वतन्त्रता।
छल रही है देश को,  देश की स्वतन्त्रता।।

बेड़ियाँ पड़ीं हैं, देवनागरी के पाँव में,
सिसक रहे सपूत, आतताइयों के गाँव में,
चल रही सरक-सरक के, देश की स्वतन्त्रता।
छल रही है देश को,  देश की स्वतन्त्रता।।

चूना भी वही है और, पानदान भी वही,
बागडोर जिनके हाथ, खानदान भी वही,
ढल रही शबाब में, स्वदेश की स्वतन्त्रता।
छल रही है देश को,  देश की स्वतन्त्रता।

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर.....स्वतंत्रता के दोनों जगह माइने बदल जाते हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  2. आप की रचना 20 अगस्त, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर
    ढल रही शबाब में, स्वदेश की स्वतन्त्रता।
    छल रही है देश को, देश की स्वतन्त्रता।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सुंदर रचना धन्यवाद जी

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत खूबसूरती से आपने देश के हालात लिख दिए हैं ...सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर गीत है शास्त्री जी ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने देश की हालत को बखूबी शब्दों में पिरोया है!

    उत्तर देंहटाएं
  8. खल रही विदेश को, देश की स्वतन्त्रता।
    छल रही है देश को, देश की स्वतन्त्रता।।

    padhkar mazaa aaya.

    उत्तर देंहटाएं
  9. खा रहे हैं देश की, गा रहे विदेश की,
    खिल्लियाँ उड़ा रहे हैं, भारतीय वेश की,
    संभल रही है दासता, पिघल रही स्वतन्त्रता।
    छल रही है देश को, देश की स्वतन्त्रता।।

    सच कहा…………आज सबका यही दर्द है और कुछ ना कर पाने की विवशता से लाचार हैं……………बेहतरीन अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  10. कटु यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से ह्रदय तक पहुंचा उसे उद्वेलित करती अतिसुन्दर रचना...
    प्रवाहमयी बहुत ही सुन्दर गीत....

    उत्तर देंहटाएं
  11. खा रहे हैं देश की, गा रहे विदेश की,
    खिल्लियाँ उड़ा रहे हैं, भारतीय वेश की,
    संभल रही है दासता, पिघल रही स्वतन्त्रता।
    छल रही है देश को, देश की स्वतन्त्रता।।


    एक और बढ़िया रचना शास्त्री जी,
    खा रहे इस देश का , जमा कर रहे विदेश में
    परिंदों को खा रहे बाज, कबूतरों के भेष में !!

    उत्तर देंहटाएं
  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

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