"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

"मोटा-झोटा कात रहा हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

रुई पुरानी मुझे मिली है, मोटा-झोटा कात रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

खोटे सिक्के जमा किये थे, 
मीत अजनबी बना लिए थे,
सम्बन्धों की खाई को मैं, खुर्पी लेकर पाट रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

सुख का सूरज नजर न आता,
दुख का बादल हाड़ कँपाता,
नभ पर जमे हुए कुहरे को, दीप जलाकर छाँट रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

आशाएँ हो गयी क्षीण हैं,
सरिताएँ जल से विहीन हैं,
प्यास बुझाने को मैं अपनी, तुहिन कणों को चाट रहा हूँ ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

कैसे मैं वाटिका सजाऊँ,
नूतन बिम्ब कहाँ से लाऊँ,
जो कुछ बोया था खेतों में, उसको ही मैं काट रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. sambandhon ki khai ko khurpi lekar paat raha hun .......bhav-vibhor karti rachna .

    उत्तर देंहटाएं
  2. रुई पुरानी मुझे मिली है, मोटा-झोटा कात रहा हूँ।
    मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

    सफल आदमी वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आप को समय के अनुसार ढाल ले और उनसे संघर्ष करते हुए भी चहरे पर शिकन न आने दे. बहुत ही प्रेरक अभिव्यक्ति. आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुंदर रचना....आपकी कविताये पढ़ कर आनंद आता है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया. शास्त्री जी, आप यूं ही हमें नित नई बढ़िया शब्द पढ़ाते रहें..

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी कविताये तो पढता ही हूं लेकिन टिप्पणी नही कर पाता हूं क्योकि मेरा इतना स्तर नही .
    बहुत सुन्दर आदि लिखने से मै सम्झता हूं कविता को आत्मसात करना अच्छा रहेगा .
    मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।
    अगर प्यार ऎसा बाटा जाये तो नफ़रत तो कही पनपे ही नही

    उत्तर देंहटाएं
  6. aise geeton ka srijan aur prakashan bahut zaroori hai dada !

    ab kalamkaron se hi ummid hai ki ve janta ko is kadar jagrit kare ki vah apne desh kal aur samaaj ko bachane ki koshish kare....

    sambandh, anubandh aur prabandh sab gaddmadd ho gaye hain aapas me....

    aise kaale kaal me aapka srijan jugnu ki bhanti timtima raha hai

    ye dekh kar mujhe aanand aa raha hai

    aapki lekhni stutya hai !

    उत्तर देंहटाएं
  7. एक और सुन्दर रचना पढने को मिली
    कुछ बोया था खेतों में, उसको ही मैं काट रहा हूँ।
    मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।
    आभार
    - विजय तिवारी "किसलय" जबलपुर
    #comments

    उत्तर देंहटाएं
  8. शास्त्री जी, बहुत ही शानदार कविता। कई बार गा चुका!

    उत्तर देंहटाएं
  9. यह प्यार भरी पंक्तियाँ सुन हृदय द्रवित हो जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. विचारों का बढ़िया बहाव है, एकदम लय में.....
    जारी रखिये ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. नभ पर जमे हुए कुहरे को, दीप जलाकर छाँट रहा हूँ

    असंभव काम करने की कोशिश ...
    यह रचना बहुत कुछ कह गयी ....कुछ व्यथा सी दिखी ...गीत बहुत सुन्दर है

    उत्तर देंहटाएं
  12. शास्‍त्रीजी, आज बहुत ही श्रेष्‍ठ कविता आपने पोस्‍ट की है। आपको बधाई, बस ऐसा ही लिखा हमें पढाते रहें।

    उत्तर देंहटाएं
  13. सुख का सूरज नजर न आता,
    दुख का बादल हाड़ कँपाता,
    नभ पर जमे हुए कुहरे को, दीप जलाकर छाँट रहा हूँ।
    मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

    हर बार एक नया अन्दाज़ लेकर आ रहे हैं…………कितने गहरे भावों को संजोया है…………बेहद उम्दा रचना दिल को छू गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  14. खोटे सिक्के जमा किये थे,
    मीत अजनबी बना लिए थे,
    सम्बन्धों की खाई को मैं, खुर्पी लेकर पाट रहा हूँ।
    मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

    बेहतरीन रचना शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत ही सहज गीत के माध्यम से जीवन सार कह दिया - सादर

    उत्तर देंहटाएं
  16. .

    प्यास बुझाने को मैं अपनी, तुहिन कणों को चाट रहा हूँ ।
    मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

    बेहतरीन भावुक प्रस्तुति !

    .

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails