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शनिवार, 11 दिसंबर 2010

"सबके मन को बहलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

काँटों में भी मुस्काते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।

नागफनी की शैया पर भी,
ये हँसते-खिलते जाते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।
सुन्दर सुन्दर गुल गुलाब के,
सारा उपवन महकाते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।
नीम्बू की कण्टक शाखा पर,
सुरभित होकर बलखाते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।

काँटों में भी मुस्काते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. काँटों में भी मुस्काते हैं।
    सबके मन को बहलाते हैं।।
    बहुत सुंदर .....

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (13/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर शाश्त्री जी.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. अच्छे भावपूर्ण उद्गार, कांटों में भी मुस्काते हैं ,
    सबके मन को बहलाते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी कविता पढ़ने पर लू में शीतल छाया की सुखद अनुभूति मिलती है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. नागफनी की शैया पर भी,
    ये हँसते-खिलते जाते हैं।
    waah!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही खुबसुरत रचना.......मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना" साथ ही मेरी कविताएँ हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" पर प्रकाशित....आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे....धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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