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रविवार, 19 दिसंबर 2010

"ग़ज़ल:आशा शैली" (प्रस्तोता:डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

ऐ हवा इतना न इतरा, तू बड़ी नादान है
आँधियों में भी जलेंगे, जिन दियों में जान है

गूँजती है कोहसारों में, फ़क़त तेरी सदा
हमनवा कोई नही, तू किसलिए हैरान है

कल तलक मुँह में नहीं थी, जिस परिन्दे के ज़ुबां
आज उसके हौसलों पर, कुल जहाँ हैरान है

दूर से उड़कर बदलती रुत में, जो आते रहे
उन परिन्दों की बदौलत, वक्त की पहचान है

एक तनहा पेड़ लड़ता है, हवा से आज तक
जिसकी पामाली ज़माने भर का ही अरमान है

मैं ठिठकती हाँफती, रस्ते पे अपने बढ़ चली
सोचती थी राह जीवन की बड़ी आसान है

लोग कहते है दिया वो बुझ गया, लेकिन नहीं
ये ग़ज़ल पारा मेरे रहबर का ही एहसान है
आशा शैली "हिमाचली"
---------

14 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद प्रशंसनीय प्रस्तुति।

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  2. दूर से उड़कर बदलती रुत में, जो आते रहे
    उन परिन्दों की बदौलत, वक्त की पहचान है
    बहुत अच्छी ग़ज़ल। बेहतरीन।

    उत्तर देंहटाएं
  3. उन परिंदों की बदौलत ही वक़्त की पहचान है ..
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  4. मईं ठिठुरते हांपते रस्ते पे अपने बढ चली,
    सोचती थी राह जीवन की बड़ी आसान है।

    सबसे अच्छा शे'र लगा । ख़ूबसूरत ग़ज़ल मुबा्रकबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  5. जिन दियों में जान है, वही ज्योति आगे बढ़ा ले जा रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. मैं ठिठकती हाँफती, रस्ते पे अपने बढ़ चली
    सोचती थी राह जीवन की बड़ी आसान है

    उम्र का तजुर्बा बोल रहा है पूरी ग़ज़ल में .. लाजवाब ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. कल तलक मुँह में नहीं थी, जिस परिन्दे के ज़ुबां
    आज उसके हौसलों पर, कुल जहाँ हैरान है


    बहुत खूबसूरत गज़ल

    उत्तर देंहटाएं

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