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बुधवार, 15 दिसंबर 2010

"दिनचर्या" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


प्रतिदिन की दिनचर्या

रोज सुबह उठना
फूलों के गमलों में पानी देना
लेकिन
एक दिन उठने में 
हो गया विलम्ब
मैने सोचा
आज गमलों मे उगे पौधे
प्यासे होंगे 
मेरा इन्तजार कर रहे होंगे
मैं जल्दी से
पानी की बाल्टी लेकर 
छत पर गया
वहाँ मेरी छः साल की पौत्री
पौधों को सींच रही थी
वह बार-बार नीचे आती थी
और एक मग पानी लेकर 
छत पर जाती थी
मैंने उससे कहा
बिटिया? 
यह तुम क्या कर रही हो?
उसने भोले पन से उत्तर दिया
पौधों को पानी पिला रही हूँ
जो आप करते थे
वही मैं कर रही हूँ
अब मुझे विश्वास हो गया
कि आने वाली पीढ़ी के हाथों में
हमारा भविष्य सुरक्षित है
काश्...
हमारा देश भी 
................. 

13 टिप्‍पणियां:

  1. पौधों को पानी पिला रही हूँ
    जो आप करते थे
    वही मैं कर रही हूँ ...


    एक कोमल अहसास ...बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी पौत्री को हमारा आशीर्वाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बच्चे सिखाने से नहीं बल्कि देखने से सीखते हैं.आपकी पौत्री ने आपसे सीखा.
    बहुत शुभकामनाये.

    उत्तर देंहटाएं
  4. सेतुबंध के समय गिलहरी का योगदान याद आ गया! हम घर से ही कुछ संस्कार दे सकते हैं बच्चों को.. देश ने तो उम्मीदें समाप्त कर दी हैं...
    बहुत ही मासूम कविता पंडित जी!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. आशाओं को बल प्रदान करते विश्वास बड़ी शक्ति देते हैं...

    सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर,आप की बात सही हे जी, पोत्री को हमारी तरफ़ से प्यार

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही सुन्दर। बच्चे तो देखकर ही सीखते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह! दिल मे उतर गयी आपकी ये रचना और आपकी पोती मे आवेष्ठित आपके संस्कार ………………सच सुरक्षित है भविष्य ………………आपका कहना सही है काश देश का भी होता तो इन्ही के हाथो मे तो है कल ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. काश्...
    हमारा देश भी

    kash such me aisa ho pata.

    उत्तर देंहटाएं
  10. जिस तरह नन्हे बीज फूटते है पौधा और बीज बन नए पौधे की उत्त्पति होती है.. उसी तरह ये नन्हे बच्चे हमारे जीवन को आगे बढ़ाते है..हमारा भविष्य हैं ...बहुत सुन्दर रचना .. बिटिया को शुभकामनाये..

    उत्तर देंहटाएं
  11. बच्चे अपने बड़ों से ही सीखते हैं ..सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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