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सोमवार, 27 दिसंबर 2010

"मैना चहक रहीं उपवन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 सज्जनता बेहोश हो गई,
दुर्जनता पसरी आँगन में।
कोयलिया खामोश हो गई,
मैना चहक रहीं उपवन में।।


गहने तारे, कपड़े फाड़े,
लाज घूमती बदन उघाड़े,
यौवन के बाजार लगे हैं,
नग्न-नग्न शृंगार सजे हैं,
काँटें बिखरे हैं कानन में।
मैना चहक रहीं उपवन में।। 

मानवता की झोली खाली,
दानवता की है दीवाली,
चमन हुआ बेशर्म-मवाली,
मदिरा में डूबा है माली,
दम घुटता है आज वतन में।
मैना चहक रहीं उपवन में।। 

शीतलता रवि ने फैलाई,
पूनम ताप बढ़ाने आई,
बेमौसम में बदली छाई,
धरती पर फैली है काई,
दशा देख दुख होता मन में।
मैना चहक रहीं उपवन में।। 

सुख की खातिर पश्चिमवाले,
आते थे होकर मतवाले,
आज रीत ने पलटा खाया,
हमने उल्टा पथ अपनाया,
खोज रहे हम सुख को धन में।
मैना चहक रहीं उपवन में।। 

 शावक सिंह खिलाने वाले,
श्वान पालते बालों वाले,
बौने बने बड़े मनवाले,
जो थे राह दिखाने वाले,
भटक गये हैं बीहड-वन में।
मैना चहक रहीं उपवन में।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. सचमुच आजकल ऐसा ही है अपना आस-पास।

    उत्तर देंहटाएं
  2. जीवन के विविध रंगों का रोचक वर्णन।

    उत्तर देंहटाएं
  3. विविधता से रंगों का इन्द्रधनुषी गीत...

    उत्तर देंहटाएं
  4. गज़ब की रचना है...........अति सुन्दर भाव.

    उत्तर देंहटाएं
  5. ज़िंदगी के अनेक रंग दिखा दिए ....सुन्दर रचना .

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस नव गीत को पढ़ते ही जैसे इसकी एक एक पंक्तियाँ सांसों में बस गयीं !
    शावक सिंह खिलाने वाले,
    श्वान पालते बालों वाले,
    बौने बने बड़े मनवाले,
    जो थे राह दिखाने वाले,
    भटक गये हैं बीहड-वन में।
    गुरगल चहक रहीं उपवन में।।
    सच की बेबाक तस्वीर !

    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

    उत्तर देंहटाएं
  7. desh ,samaj aur jeevan ki visangatiyon ka sateek evam bhavpoorn
    chitran hua hai apke pravahyut navgeet me!
    dhanyvad shastriji!

    उत्तर देंहटाएं

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