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मंगलवार, 22 मार्च 2011

"ग़ज़ल:गुरू सहाय भटनागर बदनाम" (प्रस्तोता:डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



गम-ए-पिन्हाँ

डूब कर तेरे ख्यालों में आके बैठा हूँ
कौन सा ग़म है जिसे मैं छुपा के बैठाहूँ

बदलते दौर में कोई बफ़ा नहीं करता
चाह की फिर में शम्मा जला के बैठा हूँ

कुसूर तेरा ही नहीं किस्मत का ही होगा अपनी
दाग दामन में खुद ही लगाके बैठा हूँ

मैं तेरे ख्याल से खाली कभी नहीं रहता
तुम्हारी याद को दिल में बसा के बैठा हूँ

करके ‘बदनाम’ हमसे दूर चले जाओगें
गमे-पिन्हाँ में मैं हरन्ती मिटा के बैठा हूँ

गुरू सहाय भटनागर "बदनाम" 

13 टिप्‍पणियां:

  1. शास्त्री जी सारे शेर डायरी में नोट कर लिए है --सारे एक से बढकर एक है

    उत्तर देंहटाएं
  2. मैं तेरे ख्याल से खाली कभी नहीं रहता
    तुम्हारी याद को दिल में बसा के बैठा हूँ,,,

    बहुत ही अच्छे रचना है जी!हवे अ गुड डे !मेरे ब्लॉग पर बी आये !
    Music Bol
    Lyrics Mantra
    Shayari Dil Se
    Latest News About Tech

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन शेर कहे हैं, पढवाने का आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  4. मैं तेरे ख्याल से खाली कभी नहीं रहता
    तुम्हारी याद को दिल में बसा के बैठा हूँ

    दिल की ये बातें अच्छी लगीं।
    ग़ज़ल बहुत ही शानदार है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. अभी-अभी तो होली खेली है डाक्टर साहब। कहां ये गम का फसाना लेकर बैठ गए।

    उत्तर देंहटाएं
  6. शास्त्री जी बदनाम साहब से परिचय करवाने के लिये आप का धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  7. परिचय का आभार...पढ़कर आनन्द आ गया.

    उत्तर देंहटाएं
  8. gazal kafi achchi lagi.mai bhi apne blog per ek apni diary se bhooli bisri gazal publish kar rahi hoon jaroor padhiyega.good day.

    उत्तर देंहटाएं
  9. "बदलते दौर में कोई बफ़ा नहीं करता" - यूं ही कोई बेवफ़ा नहीं होता, कुछ तो मजबूरी रही होगी।

    उत्तर देंहटाएं

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