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रविवार, 13 मार्च 2011

"आई होली रे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


आँचल में प्यार लेकर, 
भीनी फुहार लेकर. 
आई होली, आई होली, 
आई होली रे! 

चटक रही सेंमल की फलियाँ, 
चलती मस्त बयारें। 
मटक रही हैं मन की गलियाँ,  
बजते ढोल नगारे। 

निर्मल रसधार लेकर, 
फूलों के हार लेकर, 
आई होली, आई होली, 
आई होली रे! 

मीठे सुर में बोल रही है, 
बागों में कोयलिया। 
कानों में रस घोल रही है, 
कान्हा की बाँसुरिया। 

रंगों की धार लेकर, 
सुन्दर शृंगार लेकर,  
आई होली, आई होली, 
आई होली रे! 

लहराती खेतों में फसलें, 
तन-मन है लहराया. 
वासन्ती परिधान पहनकर, 
खिलता फागुन आया, 

महकी मनुहार लेकर, 
गुझिया उपहार लेकर, 
आई होली, आई होली, 
आई होली रे!

17 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनाएँ पढ़ कर होली मय हो रहे हैं ...खूबसूरत सन्देश

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (14-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. होली आई रे !! .. बहुत सुंदर रचना ... अप्पको होली की ढेरों शुभकामनाएं ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. होली आई रे....
    सुन्दर और भावपूर्ण रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  5. होली के रंगों-सी रंग-बिरंगी रचना....

    उत्तर देंहटाएं

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