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सोमवार, 28 मार्च 2011

"रबड़ छंद भाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


गति-यति तालहीन,
रबड़ छंद भाया है।
नये-नये बिम्ब लिए,
नया छंद आया है।।

कथा और व्यथा वही,
कोई नयी बात नहीं,
छंदशास्त्र-शिल्पहीन,
गीत को बनाया है।
नये-नये बिम्ब लिए,
नया छंद आया है।।

उपवन में बौर नही,
साँझ नहीं-भोर नही,
पाश्चात्य दीन-हीन,
काव्य को दिखाया है।
नये-नये बिम्ब लिए,
नया छंद आया है।।

काया में प्राण नहीं.
पंक्तियाँ समान नहीं,
साधू है ब्रह्मलीन,
नवयुग की माया है।
नये-नये बिम्ब लिए,
नया छंद आया है।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है शास्त्री जी!
    क्या बात है!
    एक दम छल-छल करती रचना।
    दो बार गाने के बाद मन भरा। इतना प्रवाह है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. aapki ye rachna bahut rochak pravaah yukt hai.bahut achchi lagi.

    उत्तर देंहटाएं
  3. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 29 -03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. रबड़ छन्द-खूब नाम दिया आपने भी.

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक सुन्दर काव्य रचना शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  6. काया में प्राण नहीं.
    पंक्तियाँ समान नहीं,
    साधू है ब्रह्मलीन,
    नवयुग की माया है।
    नये-नये बिम्ब लिए,
    नया छंद आया है।।

    बहुत ही सुन्दर काव्य रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  7. वास्तव में प्रवाह पूर्ण काव्य ...
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  8. ---रबड छंद कोई नया नाम नहीं है---निराला जी द्वारा अतुकान्त छंद का प्रयोग किये जाने पर इसे रबड-छंद व केंचुआ छंद का नाम दिया गया था----७० साल पहले ही...
    -- गलत वर्णन है कि इसमें गति, यति ताल नहीं होती---ये सभी गतिमय, यतिबद्ध व ताल-बद्ध - सन्स्क्रित श्लोकों व मन्त्रों की भांति--अतुकान्त छंद -होते हैं ।
    ---आज इस छंद की एक मुख्य धारा को "अगीत" कहा जाता है...देखिये "अतुकान्त कविता" व अगीत..के कुछ उदाहरण.....

    "तो फ़ि क्या हुआ,
    सिद्ध राज जयसिंह;
    मर गया हाय,
    तुम पापी प्रेत उसके। "------मैथिली शरण गुप्त

    "उस पूर्ण ब्रह्म,उस पूर्ण काम से,
    पूर्ण जगत, होता विकसित;
    उस पूर्ण ब्रह्म का कौन भाग ,
    जग संरचना में, व्याप्त हुआ ?
    क्या शेष बचा ,जाने न कोई;
    वह शेष भी सदा पूर्ण रहता है।"--डा श्याम गुप्त


    "कवि चिथड़े पहने,
    चखता संकेतों का रस,
    रचता-रस, छंद, अलंकार,
    ऐसे कवि के,
    क्या कहने। "----डा रंगनाथ मिश्र ’सत्य’

    उत्तर देंहटाएं

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