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मंगलवार, 29 मार्च 2011

"ताज़ा दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


"ताज़ा दोहे" 
माँ के कोमल हृदय को, सुत देते संताप।
एक राह चलते नहीं, भरते हैं अवसाद।१।

मेरे सपने में सजा, फिर से दिलकश चाँद।
है मेरे दिलदार की, चिकनी-चिकनी चाँद।२।

अब कैसे नव सृजन हो, मनवा है हैरान।
गहरे सागर पैंठ कर, खोज रहे हैं ज्ञान।३।

 तन-मन को गद-गद करे, अनुशंसा का भाव।
तारीफों के शब्द से, जल्दी भरते घाव।४।

स्वार्थ भरे इस जगत मेंजीवित है परमार्थ।
युगों-युगों के बाद ही, आता जग में पार्थ।५।

मुक्त नहीं हो पाओगेकर लो यत्न अनेक।
छोड़ ईर्ष्या-द्वेष को, काम करो कुछ नेक।६।

चमत्कार को देख कर, नतमस्तक हैं लोग।
खुश रहने के मन्त्र से, करें पलायन रोग।७।

बना लिया है फ़ासला, हमने चारों ओर।
बिन सूरज के जगत में, कभी न होती भोर।८।

9 टिप्‍पणियां:

  1. मुक्त नहीं हो पाओगे, कर लो यत्न अनेक।छोड़ ईर्ष्या-द्वेष को, काम करो कुछ नेक।६।

    सुन्दर अतिसुन्दर दोहे यह वाला तो हमें बहुत अच्छा लगा ,बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. स्वार्थ भरे इस जगत में, जीवित है परमार्थ।
    युगों-युगों के बाद ही, आता जग में पार्थ।५।

    मुक्त नहीं हो पाओगे, कर लो यत्न अनेक।
    छोड़ ईर्ष्या-द्वेष को, काम करो कुछ नेक।६।

    बहुत बढ़िया ....अच्छी सीख और सन्देश देते दोहे

    उत्तर देंहटाएं
  3. दोहों के युग की वापसी होगी आपसे...

    उत्तर देंहटाएं
  4. जाट देवता की राम राम।
    बहुत खूब ।
    मजेदार यात्रा देखनी है, तो आ जाओ हमारे ब्लाग पर । अपनी कीमती राय जरुर दे।

    उत्तर देंहटाएं

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