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रविवार, 27 मार्च 2011

"ग़ज़ल-आशा शैली" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 ज़रा रुको तो कोई ज़िन्दगी की बात करें
फिर एक बार मुलाकात अपने साथ करें

तुम आसमां के हमें ख्वाब क्यों दिखाते हो
ज़मी के लोग हैं हम इस ज़मी की बात करें

उजाड़ जंगलों में क्या तलाशने निकले
चलो नदी पे नहीं तो नदी की बात करें

पिरामिडों में दफ़्न दौलतों को भूलो भी
किसी के ग़म की किसी की खुशी की बात करें

मुहब्बतों की बात यह जहान भूल गया
ये ज़िंदगी है तो ज़िन्दादिली की बात करें

कदम-कदम पे नफरतों के अन्धेरे हैं यहाँ
वफ़ाशआर किसी रौशनी की बात करें

ग़ज़ल का दौर है शैली कोई कलाम पढ़ो
इस अंजुमन में क्यों न ताज़गी की बात करें
श्रीमती आशा शैली "हिमाचली"

14 टिप्‍पणियां:

  1. पिरामिडों में दफ़्न दौलतों को भूलो भी
    किसी के ग़म की किसी की खुशी की बात करें

    ग़ज़ल में अलग किस्म के प्रतीक
    के इस्तेमाल से अपना कौशल ज़ाहिर कर पाने में
    सफलता ले पाने के लिए मुबारकबाद .

    उत्तर देंहटाएं
  2. कदम-कदम पे नफरतों के अन्धेरे हैं यहाँ
    वफ़ाशआर किसी रौशनी की बात करें
    वाह... बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन, बात ताज़गी की हो, नयेपन की हो।

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह! बेहद खूबसूरत ग़ज़ल...

    उत्तर देंहटाएं
  5. इस सुन्दर गजल के लिए आशा जी का आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  6. आशा जी की सुन्दर गजल पढ़वाने के लिये धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  7. पिरामिडों में दफ़्न दौलतों को भूलो भी
    किसी के ग़म की किसी की खुशी की बात करें

    बेहतरीन अभिव्यक्ति ।

    .

    उत्तर देंहटाएं
  8. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 29 -03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  9. तुम आसमां के हमें ख्वाब क्यों दिखाते हो
    ज़मी के लोग हैं हम इस ज़मी की बात करें
    bahut badhiyaa

    उत्तर देंहटाएं

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