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गुरुवार, 31 मार्च 2011

"श्वाँसों की सरगम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कल-कल, छल-छल करती गंगा,
मस्त चाल से बहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।।

हो जाता निष्प्राण कलेवर,
जब धड़कन थम जाती हैं।
सड़ जाता जलधाम सरोवर,
जब लहरें थक जाती हैं।
चरैवेति के बीज मन्त्र को,
पुस्तक-पोथी कहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।।

हरे वृक्ष की शाखाएँ ही,
झूम-झूम लहरातीं हैं।
सूखी हुई डालियों से तो,
हवा नहीं आ पाती है।
जो हिलती-डुलती रहती है,
वही थपेड़े सहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।।

काम अधिक हैं थोड़ा जीवन,
झंझावात बहुत फैले हैं।
नहीं हमेशा खिलता गुलशन,
रोज नहीं लगते मेले हैं।
सुख-दुख की आवाजाही तो,
सदा संग में रहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।। 

9 टिप्‍पणियां:

  1. जिन्दगी का फलसफा भर दिया आपने इस कविता में..

    उत्तर देंहटाएं
  2. स्वासों की सत्यता बयान करदी आपने |बहुत अच्छी रचना पढ़ने को मिली आभार
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  3. काम अधिक हैं थोड़ा जीवन,
    झंझावात बहुत फैले हैं।
    नहीं हमेशा खिलता गुलशन,
    रोज नहीं लगते मेले हैं।
    सुख-दुख की आवाजाही तो,
    सदा संग में रहती है।
    श्वाँसों की सरगम की धारा,
    यही कहानी कहती है।।

    bahut sundar rachna--shastri ji!pranaam !

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुख-दुख की आवाजाही तो,सदा संग में रहती है।श्वाँसों की सरगम की धारा,यही कहानी कहती है।।

    क्या बात कही है…………बिल्कुल सटीक्……………बहुत ही सुन्दर , लयबद्ध रचना ………बहुत अच्छी लगी।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुख-दुख की आवाजाही तो,
    सदा संग में रहती है।
    श्वाँसों की सरगम की धारा,
    यही कहानी कहती है।। ....


    जीवन दर्शन समझा दिया. आभार

    उत्तर देंहटाएं

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