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शनिवार, 11 मई 2013

"बलि का बकरा...कौन...?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

यह व्यंग्य नहीं हक़ीक़त है!

दबंग दीदी की ऐंठ
सरकार से किया किनारा 
बंसल की पैंठ 
सोनिया का इशारा 
मनमोहन का सहारा 
बन गये मन्त्री 
हो गये ठाठ 
रिश्तेदार और सन्तरी 
करने लगे बन्दरबाँट 
-- 
बकरे की माँ 
कब तक खैर मनाती 
घूस आखिर 
कब तक छिप पाती? 
-- 
मन्त्री के नाती 
रँगे हाथ पकड़े गये 
खुफिया तन्त्र के 
जाल में जकड़े गये 
-- 
जब उतरने लगी 
पटरी से रेल 
बिगड़ने लगा 
बना बनाया खेल 
चक्के होने लगे जाम 
तो जपने लगे 
मनमोहन का नाम 
-- 
अब मन्त्री जी को 
याद आया बकरा 
लाओ जल्दी से कोई भी 
काला-सफेद या चितकबरा 
करो पूजा पाठ 
और कर दो हलाल 
शायद हो जाये 
कुछ कमाल! 
-- 
लेकिन बकरे की 
आह लायी रंग 
दीवाली को रास न आया 
होली का रंग और ढंग 
ये सब क्या है? 
सोनिया ने पूछा 
पी.एम. से
तब कहीं जाकर 
विदा किया मनमोहन ने 
बंसल को बेमन से! 
-- 
लेकिन दूसरा चेहरा 
लायें कहाँ से
कोयले की खान में 
सब काले ही काले हैं 
रिश्वत लेने के लिए 
सभी के जीजा हैं 
और सभी के साले हैं....! 
-- 
बकरा तो 
शहीद हो गया  
लेकिन जाते-जाते 
श्राप दे गया 
हम तो डूबे हैं सनम 
तुमको भी ले डूबेंगे  
.......!

12 टिप्‍पणियां:

  1. जाते जाते श्राप दे गया
    हम तो डूबे हैं तुम्हें भी ले डूबेंगे।
    बात सही है
    पर बंसल ने तो मलाई खाई थी
    बेचारे बकरे की तो बस शामत ही आई थी।

    बहुत सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. ये तो होना ही था,बेहतरीन प्रस्तुति,सादर आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  3. व्यंग्यदार प्रस्तुति ...बहुत बढिया

    उत्तर देंहटाएं
  4. बकरे कि अम्मा आखिर कब तक खैर मनाती इसलिए दोनों को ही जाना था और चले गए !!

    उत्तर देंहटाएं
  5. ये तो बकरे का उल्टा टोटका हो गया?:)

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  6. yahi hona tha aur ho hi gya ,thoda aur pahle ho jata to aur thik hota

    उत्तर देंहटाएं
  7. बकरे की जगह अगर करते गौदान !
    तो शायद हो जाता कल्याण!
    गाय हमारी माता है
    मातृ दिवस से नाता है
    पर ये अकल कैसे आयेगी
    दुरबुदधि जो मन से जायेगी

    उत्तर देंहटाएं

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