![]() (१)
चले जाते हैं मगर ज्ञान नहीं होता है।
लक्ष्य पाने का पथ आसान नहीं होता है।
मत कभी भूल से जाना न किसी महफिल में-
बिन बुलाए तो कभी मान नहीं होता है।
![]() (२)
पेट में आग को जो खूब लगा देता है।
अच्छा खाना हो अगर भूख जगा देता है।
दिन जवानी के कभी लौट के न आते हैं-
ढल गयी उम्र तो फिर “रूप” दग़ा देता है।
“मयंक”
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बहुत बढ़िया मुक्तक
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंमित्र ये मुक्तक बहुत ही गम्भीर हैं |देखो मित्र -
जवाब देंहटाएंहै वही इंसान सच, 'सच' को स्वीकारा जिसने |
हकीकत के नीर से उम्र को निखारा जिसने ||
उठ गया वह औरों से ऊपर रे 'मितवा' --
हाँ 'हठी दुराग्रह' को संयम से मारा जिसने ||
बहुत खूब !
जवाब देंहटाएंचर्चा मंच में इस पोस्ट का लिंक नहीं बन रहा है !
बड़ी अच्छी बातें कही हैं आपने..आभार।
जवाब देंहटाएंबिन बुलाए तो कभी मान नहीं होता है।
जवाब देंहटाएंबहुत ही बेहतरीन बोधकारी मुक्तक हैं,आपका आभार.
.सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई
जवाब देंहटाएंbahut khub guru ji kya baat hai ?
जवाब देंहटाएंमुक्तक बढिया है पर ये थाली अकेले ही क्यों खा रहे अहिं महाराज? जरा इधर भी भिजवावो ना.:)
जवाब देंहटाएंरामराम.
क्या कहने
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
बहुत खूबसूरत मुक्तक
जवाब देंहटाएंवाह बहुत सुन्दर्...आभार्
जवाब देंहटाएं(१)
जवाब देंहटाएंचले जाते हैं मगर ज्ञान नहीं होता है।
लक्ष्य पाने का पथ आसान नहीं होता है।
मत कभी भूल से जाना न किसी महफिल में-
बिन बुलाए तो कभी मान नहीं होता है।
बढ़िया नसीहत मुलायम अमर सिंह जो को
.आवत ही हरखे नहीं ,नैनं नहीं स्नेह ,
तुलसी तहां न जाइए ,चाहे कंचन बरखे मेह .
बेहतरीन मुक्तक!!
जवाब देंहटाएंअच्छी सीख देते मुक्तक ....
जवाब देंहटाएंआपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल १४ /५/१३ मंगलवारीय चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।
जवाब देंहटाएंसच कह है शास्त्री जी ... बिन बुलाये कहीं मान नहीं होता ...
जवाब देंहटाएंलाजवाब हैं दोनों मुक्तक ...
बेहतरीन मुक्तक
जवाब देंहटाएंव्यवहारिक ज्ञान की प्रेणना देते हुये
सादर
आग्रह है पढ़े "अम्मा"
http://jyoti-khare.blogspot.in
waah .....jabaav nahi ..lajabaav .....
जवाब देंहटाएंबेहतरीन , थाली देख के तो वाकई भूख लग आयी ..सादर प्रणाम के साथ
जवाब देंहटाएंबढ़िया मुक्तक
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