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सोमवार, 13 मई 2013

"दो मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


(१)
चले जाते हैं मगर ज्ञान नहीं होता है।
लक्ष्य पाने का पथ आसान नहीं होता है।
मत कभी भूल से जाना न किसी महफिल में-
बिन बुलाए तो कभी मान नहीं होता है।

(२)
पेट में आग को जो खूब लगा देता है।
अच्छा खाना हो अगर भूख जगा देता है।
दिन जवानी के कभी लौट के न आते हैं-
ढल गयी उम्र तो फिर “रूप” दग़ा देता है।
“मयंक”

21 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. मित्र ये मुक्तक बहुत ही गम्भीर हैं |देखो मित्र -
    है वही इंसान सच, 'सच' को स्वीकारा जिसने |
    हकीकत के नीर से उम्र को निखारा जिसने ||
    उठ गया वह औरों से ऊपर रे 'मितवा' --
    हाँ 'हठी दुराग्रह' को संयम से मारा जिसने ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब !
    चर्चा मंच में इस पोस्ट का लिंक नहीं बन रहा है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बड़ी अच्छी बातें कही हैं आपने..आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बिन बुलाए तो कभी मान नहीं होता है।

    बहुत ही बेहतरीन बोधकारी मुक्तक हैं,आपका आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  6. मुक्तक बढिया है पर ये थाली अकेले ही क्यों खा रहे अहिं महाराज? जरा इधर भी भिजवावो ना.:)

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह बहुत सुन्दर्...आभार्

    उत्तर देंहटाएं
  8. (१)
    चले जाते हैं मगर ज्ञान नहीं होता है।
    लक्ष्य पाने का पथ आसान नहीं होता है।
    मत कभी भूल से जाना न किसी महफिल में-
    बिन बुलाए तो कभी मान नहीं होता है।
    बढ़िया नसीहत मुलायम अमर सिंह जो को

    .आवत ही हरखे नहीं ,नैनं नहीं स्नेह ,

    तुलसी तहां न जाइए ,चाहे कंचन बरखे मेह .

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल १४ /५/१३ मंगलवारीय चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

    उत्तर देंहटाएं
  10. सच कह है शास्त्री जी ... बिन बुलाये कहीं मान नहीं होता ...
    लाजवाब हैं दोनों मुक्तक ...

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  11. बेहतरीन मुक्तक
    व्यवहारिक ज्ञान की प्रेणना देते हुये
    सादर

    आग्रह है पढ़े "अम्मा"
    http://jyoti-khare.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  12. बेहतरीन , थाली देख के तो वाकई भूख लग आयी ..सादर प्रणाम के साथ

    उत्तर देंहटाएं

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