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सोमवार, 27 मई 2013

"लू के गरम थपेड़े खाकर,अमलतास खिलता-मुस्काता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

"मेरी एक पुरानी रचना"

सूरज की भीषण गर्मी से,
लोगो को राहत पहँचाता।।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।

डाली-डाली पर हैं पहने
झूमर से सोने के गहने,
पीले फूलों के गजरों का,
रूप सभी के मन को भाता।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।

दूभर हो जाता है जीना,
तन से बहता बहुत पसीना,
शीतल छाया में सुस्ताने,
पथिक तुम्हारे नीचे आता।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।

स्टेशन पर सड़क किनारे,
तन पर पीताम्बर को धारे,
दुख सहकर, सुख बाँटो सबको,
सीख सभी को यह सिखलाता।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. अमलतास पर बहुत ही सुन्दर रचना,आभार आदरणीय.

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस समय सोने की तरह लगता है, अमलतास.

    उत्तर देंहटाएं
  3. मित्र, परसों अमलताश के मनोहारी चित्र खींच कर लाया |अब कुछ दिनों के बाड़ गीत या लेख पोस्ट करूँगा |
    बहु ही सटीक अभिव्यक्ति ! घोर दुखोँ में सुखों का अहसास कोई अमलताश से सीखे ! प्रेरणाप्रद
    रचना |

    उत्तर देंहटाएं
  4. मित्र, परसों ही अमलताश के कुछ चित्र खींच कर कर लाया |लों एक प्रेरणाप्रद रचना सामने आ गयी |दुखोँ में भी सुखों का अनुभव ! बहुत ही सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  5. अति सुंदर.... मयंक जी... अमलतास पर कविता देखी, मेरा मन खुलकर मुस्काया...

    उत्तर देंहटाएं
  6. हमारा तो गर्मी से बुरा हाल है लेकिन कठिन घडी में कैसे हँसते मुस्कुराते हैं यह सीख दे रहा है अमलतास हमें ..
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  7. अमलतास की शिक्षाप्रद कविता ........
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं

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