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मंगलवार, 21 मई 2013

"कवि मदन “विरक्त” के सम्मान में कवि गोष्ठी सम्पन्न" ( रपट-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)'

साहित्य शारदा मंच, खटीमा के तत्वावधान में
लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार और सम्पादक
कवि मदन “विरक्त” के सम्मान में कवि गोष्ठी सम्पन्न...!
आज 20 मई, 2013 को खटीमा में डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री के निवास पर लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार और सम्पादक
कवि मदन “विरक्त” के सम्मान में कवि गोष्ठी सम्पन्न हुई...!

(चित्र में (बायें से) डॉ.सिद्धेश्वर सिंह, मदन विरक्त, गेंदालाल शर्मा निर्जन, गुरूसहाय भटनागर बदनाम, डॉ.राज सक्सेना,  अवनीश मिश्र और डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”) 
जिसकी अध्यक्षता खटीमा के सशक्त कवि डॉ. राज सक्सेना ने की।
इस अवसर पर हास्य कवि गेंदा लाल निर्जन, ओजस्वी युवा कवि अवनीश मिश्र, रूमानियत के शायर गुरूसहाय भटनागर, जाल जगत पर अनुवादक के रूप में माने जाने वाले, गम्भीर और गूढ़ लेखन के धनी डॉ.सिद्धेश्वर सिंह, और आयोजक कवि डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक” ने भाग लिया।
“मेरी गंगा भी तुम और यमुना भी तुम,
तुम ही मेरे सकल काव्य की धार हो।"
गोष्ठी शुभारम्भ डॉ. मयंक की सरस्वती वन्दना से किया गया। अपनी ग़ज़ल सुनाते हुए उन्होंने कहा-
“बुड़्ढों के हैं ढंग निराले,
बुड्ढे हैं जवान दिलवाले।“
इसके बाद हास्य व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर कवि गेंदालाल निर्जन ने अपना काव्य पाठ करते हुए कहा-
“एक नेता जी से हमने पूछा-
आपका नाम किसी घोटाले में नहीं आया!
नेता जी ने कहा-
हमने आजतक किसी को कभी नहीं दिया धोखा।
हम इसलिय़े ईमानदार हैं, क्योंकि हमें आज तक मिला ही नहीं मौका!”
रूमानियत के शायर गुरुसहाय भटनागर “बदनाम ने इस अवसर पर अपनी ग़ज़ल पेश करते हुए कहा-
“हवाओं का रुख़ बदल देतीं, तो शाखें बच गयीं होती,
उन्हीं शाख़ों की ज़द में क्यों बनाया आशियाँ हमने।
हमें “बदनाम हो जाने का कोई गम नहीं हैं अब,
चलो वो ह़क मोहब्बत का अदा फिर कर दिया हमने।।“
डॉ. सिद्धेश्वर सिंह ने अपने काव्य पाठ में अपनी रचना का वाचन करते हुए कहा-
“लो आ गयी बिजली
जगमग-जगमग करने लगा है बाज़ार
खड़े-खड़े फूँक दिया कितना ईंधन
कब की ढल चुकी शाम
और कितना-कितना
नया बचा है ज़रूरी काम...”
ओज के युवा कवि अवनीश मिश्रा ने अपना काव्य पाठ करते हुए कहा-
“इसलिए वो मुझको करना बेजुबान चाहता है,
क्योंकि महफिल में बन जाना वो महान चाहता है...”
गोष्ठी के मुख्यअतिथि दिल्ली से पधारे कवि मदन विरक्त ने अपनी रचना का पाठ करते हुए कहा-

“वीरों की माता हूँ वीरों की बहना,
पत्नी उस वीर की हूँ शस्त्र जिसका गहना...”
अन्त में गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डॉ. राज सक्सेना ने अपना अन्दाजे बयां इस शेर के साथ किया-
“कुछ लोग तो जीते हैं पलभर में ज़िन्दग़ी को,
कुछ लोग सौ बरस में पलभर भी नहीं जीते।“
इस अवसर पर गोष्ठी के आयोजक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने 

मुख्य अतिथि मदन विरक्त को अपनी दो पुस्तकों धरा के रंग और हँसता-गाता बचपन को सादर भेंट किया।

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर गोष्ठी ........
    बुद्धिजीवियों का महा सम्मलेन
    सशक्त रचनाएं .........
    “कुछ लोग तो जीते हैं पलभर में ज़िन्दग़ी को,
    कुछ लोग सौ बरस में पलभर भी नहीं जीते।“

    बधाई एवं शुभकामनायें ..............

    उत्तर देंहटाएं
  2. सफल कवि गोष्ठी आयोजन के लिए बहुत बहुत बधाई ,,,,,,

    Recent post: जनता सबक सिखायेगी...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर

    1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
      आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
      आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (08-04-2013) के "http://charchamanch.blogspot.in/2013/04/1224.html"> पर भी होगी! आपके अनमोल विचार दीजिये , मंच पर आपकी प्रतीक्षा है .
      सूचनार्थ...सादर!

      हटाएं
    2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
      आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (22-05-2013) के कितनी कटुता लिखे .......हर तरफ बबाल ही बबाल --- बुधवारीय चर्चा -1252 पर भी होगी!
      सादर...!

      हटाएं
  3. बहुत मजा आया गोष्ठी देख कर ....

    उत्तर देंहटाएं
  4. वधाई !
    ग्रीष्म के भी काल में, बासंती है जूनून |
    भ्रमरों की गुंजार से,वंचित रहे "प्रसून" ||

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  5. कवि गोष्ठी आयोजन के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ,बहुत ही सुन्दर.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सभी कवियों की बेहतरीन रचनायें पढने को मिलीं ..सादर बढ़ाई के साथ

    उत्तर देंहटाएं
  7. स्वर्णिम पल,सुन्दर मनन,अनुपम कथन उवाच |
    श्रेष्ठ पलों को याद कर, करता मनुआ नाच ||

    उत्तर देंहटाएं
  8. स्वर्णिम पल,सुन्दर सजे,अनुपम कथन उवाच |
    श्रेष्ठ पलों की याद में , करता मनुआ नाच ||

    उत्तर देंहटाएं

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