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सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

"दीप जलाएँ" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक")

अन्धकार को दूर भगाएँ
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।
जागो अब हो गया सवेरा,
दूर हो गया तम का घेरा,
शिक्षा की हम अलख जगाएँ।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

कुक्कुट कुकड़ूँकू चिल्लाया,
चिड़ियों ने भी गीत सुनाया,
आओ हम भी खिलकर गायें।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

घर-आँगन को आज बुहारें,
कभी न हिम्मत अपनी हारें,
जीने का ढंग हम सिखलाएँ।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

खिड़की दरवाजों को खोलें,
वेदों के मन्त्रों को बोलें,
पूजा के हम थाल सजाएँ।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।
माता की आरती उतारें,
स्वर भरकर अर्चना उचारें,
ज्ञान-रश्मियों को फैलाएँ।
मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. माता की आरती उतारें,
    स्वर भरकर अर्चना उचारें,
    ज्ञान-रश्मियों को फैलाएँ।
    मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

    श्रेष्ठ संदेश से युक्त उत्तम बालगीत पढ़कर अच्छा लगा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. माता की आरती उतारें,
    स्वर भरकर अर्चना उचारें,
    ज्ञान-रश्मियों को फैलाएँ।
    मन मन्दिर में दीप जलाएँ॥

    ज्ञान दीप हमेशा जलते रहना चाहिये………॥बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीय शास्त्री जी ,

    अभिवादन

    बहुत सुन्दर गीत ,,,हर बंद प्रेरक और जीवनोपयोगी |

    बहुत-बहुत आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. शिक्षादीप - सबके लिये, पुण्य यह सब करें।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही सुंदर गीट, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. घर-आँगन को आज बुहारें,
    कभी न हिम्मत अपनी हारें,
    जीने का ढंग हम सिखलाएँ।
    मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।
    बहुत सुन्‍दर प्रस्‍तुति !

    उत्तर देंहटाएं
  8. शिक्षा की हम अलख जगाएँ।
    मन मन्दिर में दीप जलाएँ।।

    उत्तम संदेश, सभी के लिये.

    उत्तर देंहटाएं
  9. अशिक्षा के अंधकार में दीप जलाती सरस्वती का दीप पर्व!! पंडित जी बहुत सुंदर!!

    उत्तर देंहटाएं

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