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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

"कुछ दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


स्वस्थ रहें सब जगत में, दाता दो वरदान।
गर्मी, वर्षा-शीत में, दुखी न हो इन्सान।१।

हरे-भरे हों पेड़ सब, छाया दें घनघोर।
उपवन में हँसते सुमन, सबको करें विभोर।२।

ज्ञान बाँटने से कोई, होता नहीं विपन्न।
विद्या धन का दानकर, बन जाओ सम्पन्न।३।

रत्तीभर चक्खा नहीं, लिया नहीं आनन्द।
आखिर डाका पड़ गया, लुटा सभी मकरन्द।४।

भूसी-चावल सँग रहें, तभी बढ़े परिवार।
हुए धान से जब अलग, बाँट खाय संसार।५।

22 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री जी
    नमस्कार !
    ........बहुत ही सुंदर दोहे है

    उत्तर देंहटाएं
  2. हर बार की तरह शानदार प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. आद. शास्त्री जी,

    ज्ञान बाँटने से कोई, होता नहीं विपन्न।
    विद्या धन का दानकर, बन जाओ सम्पन्न।

    किस दोहे को किससे अच्छा कहूँ,सभी एक से बढ़कर एक हैं ! मैं पहले भी कह चुका हूँ जिस सादगी से आप गहरी से गहरी बात भी चंद शब्दों में कह देते हैं उससे आपकी गहन साहित्य-साधना का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. "भूसी-चावल संग रहें, तभी बढ़े परिवार।
    हुए धान से जब अलग, बाँट खाए संसार।५।....
    कहाँ समझता है आज का समय इस तथ्य को...
    "

    उत्तर देंहटाएं
  5. ज्ञान बढाते शानदार दोहे बहुत पसन्द आये………आभार्।

    उत्तर देंहटाएं
  6. ज्ञान बाँटने से कोई, होता नहीं विपन्न।
    विद्या धन का दानकर, बन जाओ सम्पन्न|
    वाह बेहतरीन दोहे हैं... बधाई एवं आभार स्वीकार करें !!

    उत्तर देंहटाएं
  7. ब्लॉग जाल पर आप तो रचते काव्य प्रसंग।
    दोहे पढ़कर आपके मन में उदित उमंग।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बढ़िया दोहे हैं शास्त्री जी ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. ज्ञान बाँटने से कोई, होता नहीं विपन्न।
    विद्या धन का दानकर, बन जाओ सम्पन्न।

    गहरे भाव। बेहतरीन प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  10. विद्या धन का दानकर, बन जाओ सम्पन्न

    अत्यंत मनोहारी दोहे
    नमन शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं

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