"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

"कैद हो गया आज सिकन्दर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



उड़ता था उन्मुक्त कभी जो नीले-नीले अम्बर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

अपनी बोली भूल गया है,
मिट्ठू-मिट्ठू कहता है,
पिंजड़े में घुट-घुटकर जीता,
दारुण पीड़ा सहता है,
कृत्रिम झूला रास न आता, तोते को बन्दीघर में
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

चंचल-चपल तोतियों के,
हो गये आज दर्शन दुर्लभ,
रास-रंग के स्वप्न सलोने,
अब जीवन में नहीं सुलभ,
बहता पानी सिमट गया है, घर की छोटी गागर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

स्वादभरे अपनी मर्जी के,
आम नहीं खा पाएगा,
फुर्र-फुर्र उड़कर नभ में,
अब करतब नहीं दिखाएगा,
तैराकी को भूल गया है, नाविक फँसा समन्दर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

छूट  गये हैं संगी-साथी,
टूट गये है तार सभी,
बन्दी की किस्मत में होता,
नहीं मुक्त संसार कभी,
उम्रकैद की सजा मिली है, नारकीय भवसागर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

इन्सानों की बस्ती में भी,
मिला नहीं इन्सान कोई, 
दिलवालों की दुनिया में भी,
रहा नहीं रहमान कोई,
दानवता छिपकर बैठी है, मानवता की चादर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

प्रजातन्त्र की हथकड़ियों में,
आजादी दम तोड़ रही,
सत्ता की आँगनबाड़ी,
जनता का रक्त निचोड़ रही,
परिधानों को छोड़, खोजता सच्चा सुख आडम्बर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! शास्त्री जी,
    इतना जीवंत शब्द-चित्र !
    पढ़ते हुए लगा जैसे पिंजरे में कैद पंक्षी स्वयं अपना दुःख प्रकट कर रहा है !
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सशकत. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन बिम्ब के माध्यम से व्यंग का पुट लिए हुए एक सशक्त रचना .
    बहुत जीवंत और सटीक.आभार इस रचना के लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  4. छूट गये हैं संगी-साथी,
    टूट गये है तार सभी,
    बन्दी की किस्मत में होता,
    नहीं मुक्त संसार कभी,
    उम्रकैद की सजा मिली है, नारकीय भवसागर में।
    कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।
    यही व्यथा तो आज के इंसान की भी है……………पंछी के प्रतीक के माध्यम से आज की रचना बेहद प्रशंसनीय बन गयी है……………मानव त्रासदी का सजीव चित्रण कर दिया ………शानदार , लाजवाब रचना बहुत पसन्द आई…………आभार्।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह जी हमेशा की तरह से बहुत अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. बेहद उम्दा। इस पर कुछ कहना हमारे लिए खता होगी।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी यह रचना पढ़ कर शिव मंगल सिंह सुमन की एक कविता याद आई ...

    हम पंछी उन्मुक्त गगन के
    पिंजरबद्ध न गा पाएंगे ...

    बहुत अच्छी कविता .

    उत्तर देंहटाएं
  8. इन्सानों की बस्ती में भी,
    मिला नहीं इन्सान कोई,
    दिलवालों की दुनिया में भी,
    रहा नहीं रहमान कोई,
    दानवता छिपकर बैठी है, मानवता की चादर में।
    कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।
    wah.bahot shandar.

    उत्तर देंहटाएं
  9. सरल संदेश में गहरा दर्शन छिपा है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. प्रजातन्त्र की हथकड़ियों में,
    आजादी दम तोड़ रही,
    सत्ता की आँगनबाड़ी,
    जनता का रक्त निचोड़ रही,....

    सच्चाई से परिपुर्ण सुन्दर और भावपूर्ण कविता के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails