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सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

"ग़ज़ल-आशा शैली हिमाचली" (प्रस्तोता-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


"ग़ज़ल"
-0-0-0- 
ग़म की रातों के डेरे बहुत हैं यहाँ 
बिजलियों के सवेरे बहुत हैं यहाँ

वो जो अपने लहू से संवारे चमन
अब न तेरे न मेरे बहुत हैं यहाँ

पर निकलते बिदकने लगे नीड़ से
उन परिन्दों के डेरे बहुत हैं यहाँ

आँख से आँख को कोई पैग़ाम दे
ऐसे बादल घनेरे बहुत हैं यहाँ

आशियाँ मत बनाना तू शैली अभी
आँधियों के तो फेरे बहुत हैं यहाँ

श्रीमती आशा शैली "हिमाचली"

8 टिप्‍पणियां:

  1. kya bat hai ! shaili ji ,khubsurat gajal ke liye sadhuvad . padha man ko chhu gaya .

    उत्तर देंहटाएं
  2. वो जो अपने लहू से संवारे चमन
    अब न तेरे न मेरे बहुत हैं यहाँ

    पर निकलते बिदकने लगे नीड़ से
    उन परिन्दों के डेरे बहुत हैं यहाँ
    बहुत खूब और मतला भी लाजवाब है। आशा शैली जी को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह ...बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत दिनों के बाद आशा जी की ग़ज़लों को पढ़ा, हर शेर नपा-तुला और अभिव्यक्तियाँ भावात्मक, खुबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकारें !

    उत्तर देंहटाएं

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