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शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

"उपवन लगे रिझाने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मौन निमन्त्रण देतीं कलियाँ, 
सुमन लगे मुस्काने।
वासन्ती परिधान पहन कर, 
उपवन लगे रिझाने।।
पाकर मादक गन्ध 
शहद लेने मधुमक्खी आई,
सुन्दर पंखोंवाली तितली
 को सुगन्ध है भाई,
चंचल-चंचल चंचरीक, 
आये गुंजार सुनाने।
वासन्ती परिधान पहन कर, 
उपवन लगे रिझाने।।
चहक रहे वन-बाग-बगीचे, 
सबका तन गदराया,
महक रहे हैं खेत बसन्ती, 
आम-नीम बौराया,
कोयल, कागा और कबूतर 
लगे रागनी गाने।
वासन्ती परिधान पहन कर, 
उपवन लगे रिझाने।।
सरसों के बिरुओं ने हैं,
पीताम्बर तन पर धारे,
मस्त पवन बह रहा
गगन में टिम-टिम करते तारे,
अंगारे से दहके रहे हैं,

वन में ढाक सुहाने।
वासन्ती परिधान पहन कर, 
उपवन लगे रिझाने।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. वासन्ती परिधान पहन कर,
    उपवन लगे रिझाने।।
    vasant per bahut pyari kavita hai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. वासन्ती परिधान पहन कर,
    उपवन लगे रिझाने।।
    बहुत सुन्दर चित्रण ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह एक और सुंदर वसंत गीत.

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह एक और सुंदर वसंत गीत.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर गीत ।जिसे मै पढते पढते गुनगुनाने लगी

    उत्तर देंहटाएं
  6. मैं भी तैयार हूं मगर मौसम टेंशन किए हुए है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. कविता और तस्वीरें दोनों मस्त।

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुंदर चित्र के संग सुंदर बसंती रचना के लिये आप का धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत ही प्यारी कविता हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  10. मन में बजते गाने,
    उपवन लगे रिझाने।

    उत्तर देंहटाएं

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