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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

"सुन्दर सा खरगोश हमारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 
रूई जैसा कोमल-कोमल,
लगता कितना प्यारा है।
बड़े-बड़े कानों वाला,
सुन्दर खरगोश हमारा है।।

बहुत प्यार से मैं इसको,
गोदी में बैठाता हूँ।
बागीचे की हरी घास,
मैं इसको रोज खिलाता हूँ।।

मस्ती में भरकर यह
लम्बी-लम्बी दौड़ लगाता है।
उछल-कूद करता-करता,
जब थोड़ा सा थक जाता है।।

तब यह उपवन की झाड़ी में,
छिप कर कुछ सुस्ताता है।
ताज़ादम हो करके ही,
मेरे आँगन में आता है।।

नित्य-नियम से सुबह-सवेरे,
यह घूमने जाता है।
जल्दी उठने की यह प्राणी,
सीख हमें दे जाता है।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत प्यार से मैं इसको,
    गोदी में बैठाता हूँ।
    बागीचे की हरी घास,
    मैं इसको रोज खिलाता हूँ।।
    बहुत खुबसुरत जीव की सुंदर कविता....

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत प्यारी कविता है |और खरगोश भी

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह जी बहुत ही सुंदर रचना, धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. 'नित्यं-नियम से सुबह-सवेरे,यह घूमने जाता है
    जल्दी उठने की यह प्राणी,सीख हमें दे जाता है.'

    सुंदर सीख दी है आपने कोमल-कोमल प्यारे खरगोश के माध्यम से.

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक सुंदर बाल-सुलभ कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर बाल कविता के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बच्चों के लिए प्रेरणादायक रचना है.

    उत्तर देंहटाएं

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