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सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

"सुखनवर तलाश करता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


ग़ज़ल
-0-0-0-
 चराग़ लेके मुकद्दर तलाश करता हूँ
मैं कायरों में सिकन्दर तलाश करता हूँ

मिला नही कोई गम्भीर-धीर सा आक़ा
मैं सियासत में समन्दर तलाश करता हूँ

लगा लिए है मुखौटे शरीफजादों के
विदूषकों में कलन्दर तलाश करता हूँ

सजे हुए हैं महल मख़मली गलीचों से
रईसजादों में रहबर तलाश करता हूँ

मिला नहीं है मुझे आजतक कोई चकमक
अन्धेरी रात में पत्थर तलाश करता हूँ

पहन लिए है सभी ने लक़ब (उपनाम) के दस्ताने
मैं इनमें सूर-सुखनवर तलाश करता हूँ

25 टिप्‍पणियां:

  1. चराग़ लेके मुकद्दर तलाश करता हूँ
    मैं कायरों में सिकन्दर तलाश करता हूँ
    मयंक जी आपकी तलाश गलत दिशा में है | अर्थपूर्ण गज़ल ,बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही उम्दा रचना , बधाई स्वीकार करें .

    आइये हमारे साथ उत्तरप्रदेश ब्लॉगर्स असोसिएसन पर और अपनी आवाज़ को बुलंद करें . फालोवर बनकर उत्साह वर्धन कीजिये

    उत्तर देंहटाएं
  3. लगा लिए है मुखौटे शरीफजादों के
    विदूषकों में कलन्दर तलाश करता हूँ
    Waah,

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहूत उम्दा रचना हर शेर लाजवाब

    उत्तर देंहटाएं
  5. मिला नहीं है मुझे आजतक कोई चकमक
    अन्धेरी रात में पत्थर तलाश करता हूँ ।

    वाकई अर्थपूर्ण तलाश...

    उत्तर देंहटाएं
  6. मिला नहीं है मुझे आजतक कोई चकमक
    अन्धेरी रात में पत्थर तलाश करता हूँ

    वाह! बहुत उम्दा गज़ल..हरेक शेर लाज़वाब..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. मिला नहीं है मुझे आजतक कोई चकमक
    अन्धेरी रात में पत्थर तलाश करता हूँ

    वाह वाह ,एक न एक दिन तो मिल ही जायेगा.बढ़िया ग़ज़ल.

    उत्तर देंहटाएं
  8. चराग़ लेके मुकद्दर तलाश करता हूँ
    मैं कायरों में सिकन्दर तलाश करता हूँ
    वाह शास्त्री जी बहुत सुंदर रचना धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 22- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

    उत्तर देंहटाएं
  10. BAHUT HI ACCHI GAZAL
    SIR JI TALASH JARUR PORI HOGI
    HUMARI DUAYE BHI AAPKE SATH HE

    उत्तर देंहटाएं
  11. शास्त्री जी, शायद आपकी पहली ग़ज़ल पढ रहा हूं। कमाल का लिखते हैं

    मिला नहीं है मुझे आजतक कोई चकमक
    अन्धेरी रात में पत्थर तलाश करता हूँ
    वाह !! क्या बात है!!

    उत्तर देंहटाएं
  12. लाजवाब। इससे ज्‍यादा क्‍या कहूं। दिल खश कर दिया आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह शास्त्री जी वाह! जिस भी विधा मे लिखते है कमाल करते हैं…………क्या खूब गज़ल लिखी है हम तो कायल हो गये आपकी लेखनी के……………मनमोहक गज़ल्।

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत ही मनमोहक गजल लिखा है आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  15. "मिला नहीं मुझे आज तक कोई चकमक अंधेरी रात में पत्थर तलाश करता हूँ "
    बहुत अच्छी लगी यह पंक्तियाँ |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  16. चराग़ लेके मुकद्दर तलाश करता हूँ
    मैं कायरों में सिकन्दर तलाश करता हूँ
    bahut achchi linen likhi hai.

    उत्तर देंहटाएं

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