"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

"एक ग़ज़ल-पुरानी डायरी से" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


एक ग़ज़ल-पुरानी डायरी से

सियाह रात है, छाया घना अन्धेरा है
अभी तो दूर तलक भी नहीं सवेरा है

अभी तो तुमसे बहुत दिल के राज़ कहने हैं
अभी फलक़ पे लगा बादलों का डेरा है

छटेंगी काली घटाएँ तो बोल निकलेंगे
गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है

हमारे घोंसलों में जिन्दगी सिसकती है
कुछ दरिन्दों ने अपने वतन को घेरा है

अभी न जाओ खतरनाक सूनी राहों पे
कदम-कदम पे खड़ा अज़नबी लुटेरा है

24 टिप्‍पणियां:

  1. हमारे घोंसलों में जिन्दगी सिसकती है
    कुछ दरिन्दों ने हमारे वतन को घेरा है
    अभी न जाओ खतरनाक सूनी राहों पे
    कदम-कदम पे खड़ा अज़नबी लुटेरा है

    आपकी पुरानी हो या नयी ………बेहतरीन होती है……………………शानदार गज़ल्।

    उत्तर देंहटाएं
  2. फिर एक बार इस खुबसूरत सी मासूम ग़ज़ल के लिए बधाईयाँ !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही उम्दा रचना , बधाई स्वीकार करें .
    आइये हमारे साथ उत्तरप्रदेश ब्लॉगर्स असोसिएसन पर और अपनी आवाज़ को बुलंद करें .कृपया फालोवर बन उत्साह वर्धन कीजिये

    उत्तर देंहटाएं
  4. हमारे घोंसलों में जिन्दगी सिसकती है
    कुछ दरिन्दों ने हमारे वतन को घेरा है
    शानदार गज़ल्...

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह जी बहुत सुंदर गजल, ध्न्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूब .... बेहतरीन ग़ज़ल है !

    उत्तर देंहटाएं
  7. हमारे घोंसलों में जिन्दगी सिसकती है
    कुछ दरिन्दों ने अपने वतन को घेरा है

    वाह! बहुत ख़ूबसूरत गज़ल...

    उत्तर देंहटाएं
  8. सर आप तो पारस है पत्थर भी छुएगें तो सोना हो जाएगा। हमें गर्व है कि आप जैसे लोगों की रचना पढ़ने का सौभाग्य मिलता है। क्या फर्क पड़ता है कि रचना नई हो या पुरानी। बेहतरीन गजल। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत खूबसूरत गजल| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  10. एक और उम्दा ग़ज़ल।
    आपका जवाब नहीं शास्त्री जी।

    उत्तर देंहटाएं
  11. हमारे घोंसलों में जिन्दगी सिसकती है
    कुछ दरिन्दों ने अपने वतन को घेरा है
    बहुत अच्छी कविता। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  12. अभी तो तुमसे बहुत दिल के राज़ कहने हैं
    अभी फलक़ पे लगा बादलों का डेरा है

    khoobsurati ki paraakashthaa ko chhotee gazal.

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत ही प्‍यारी गजल है। कभी कभी ऐसे ही पुरानी डायरी के पन्‍ने पलटते रहा करिए।

    ---------
    ब्‍लॉगवाणी: ब्‍लॉग समीक्षा का एक विनम्र प्रयास।

    उत्तर देंहटाएं
  14. अभी तो तुमसे बहुत दिल के राज़ कहने हैं
    अभी फलक़ पे लगा बादलों का डेरा है

    vaah

    उत्तर देंहटाएं
  15. छटेंगी काली घटाएँ तो बोल निकलेंगे
    गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है
    purani bhi bahut achchi nikli.

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails