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बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

"धूप के दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


तेज घटा जब सूर्य का, हुई लुप्त सब धूप।
वृद्धावस्था में कहाँ, यौवन जैसा रूप।।

बिना धूप के किसी का, निखरा नहीं स्वरूप।
जड़, जंगल और जीव को, जीवन देती धूप।।

सुर, नर, मुनि के ज्ञान की, जब ढल जाती धूप।
छत्र-सिंहासन के बिना, रंक कहाते भूप।।

बिना धूप के खेत में, फसल नहीं उग पाय।
शीत, ग्रीष्म, वर्षाऋतु, भुवनभास्कर लाय।।

शैल शिखर उत्तुंग पर, जब पड़ती है धूप।
हिमजल ले सरिता बहें, धर गंगा का रूप।।

नष्ट करे दुर्गन्ध को, शीलन देय हटाय।
पूर्व दिशा के द्वार पर, रोग कभी ना आय।।

खग-मृग, कोयल-काग को, सुख देती है धूप।
उपवन और बसन्त का, यह सवाँरती रूप।।



23 टिप्‍पणियां:

  1. तेज घटा जब सूर्य का, हुई लुप्त सब धूप।
    वृद्धावस्था में कहाँ, यौवन जैसा रूप।।

    बिना धूप के किसी का, निखरा नहीं स्वरूप।
    जड़, जंगल और जीव को, जीवन देती धूप।।

    बहुत ही शानदार दोहे रचे हैं ………संदेश भी दे रहे हैं , आगाह भी कर रहे हैं और धूप का महत्त्व भी बता रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. "खग-मृग, कोयल-काग को, सुख देती है धूप।
    उपवन और बसन्त का, यह सवाँरती रूप।"
    क्या बात है..शास्त्री जी आपके दोहे लाजवाब है।बहुत ही सुंदर।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (24-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. शैल शिखर उत्तुंग पर, जब पड़ती है धूप।
    हिमजल ले सरिता बहें, धर गंगा का रूप।।
    बहुत शानदार दोहे हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बिना धूप के किसी का, निखरा नहीं स्वरूप।
    जड़, जंगल और जीव को, जीवन देती धूप।।
    सन्देश देती हुई रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  6. Dhoop ke bina jag me jivan sambhav
    hi nahi lagta."poorv disha ke dwar
    per,rog kabhi naa aaye" Shastri ji
    jara is par aur prakash daalen to
    kirpa hogi.

    उत्तर देंहटाएं
  7. धुप तो इस धरा के जिन्दगी का रूप है। सुंदर रचना। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  8. धुप तो इस धरा के जिन्दगी का रूप है। सुंदर रचना। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  9. नष्ट करे दुर्गन्ध को, शीलन देय हटाय।
    पूर्व दिशा के द्वार पर, रोग कभी ना आय।।
    बहुत अच्छे दोहे शास्त्री जी।
    यह तो स्लोगन के समान सब जगह बांट देना चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  10. अच्‍छे दोहे। धूप यानि सूरज के महत्‍व को साबित करती रचना। बधाई हो आपको।

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुन्दर! ठण्ड से ठिठुरते दोहे याद आ गए!

    उत्तर देंहटाएं
  12. बिना धूप के किसी का, निखरा नहीं स्वरूप।
    जड़, जंगल और जीव को, जीवन देती धूप।।

    खूबसूरत भाव रचना मेँ ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. खग-मृग, कोयल-काग को, सुख देती है धूप।उपवन और बसन्त का, यह सवाँरती रूप।।


    बहुत अच्छे लगे धूप के दोहे.

    उत्तर देंहटाएं
  14. सारे दोहे बढ़िया हर लिहाज से.आप बहुत अच्छा लिखते हैं , शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  15. धूप के दोहों में ज़िंदगी की धूप खिल रही है ...बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  16. शैल शिखर उत्तुंग पर, जब पड़ती है धूप।
    हिमजल ले सरिता बहें, धर गंगा का रूप।।..

    दोहे बहुत ही शानदार हैं ....
    लाजवाब ...
    ..आभार.

    उत्तर देंहटाएं

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