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शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

"पाँच सीपिकाएँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



(१)

अरे मुन्ना भाई
नहीं-नहीं जी, अब तो
मैं हूँ अन्नाभाई
(२)
शराब वही
बोतल नई
कैसी रही
(३)
रूप बदला है
ऐब छिपाया है
धोखा देने के लिए
(४)
गद्य लिखता हूँ
लाइनों को तोड़ कर
कविता बन जाती है
(५)
शब्द गौण हैं
अर्थ मौन हैं
इसीलिए श्रेष्ठ रचना है

24 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! वाह! क्या बात है! छोटी सी सुन्दर पंक्तियों में आपने बहुत कुछ कह दिया! लाजवाब प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह ...बहुत ही बढि़या प्रस्‍तुति ..आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. जय हो

    मै सबको लिखता देख के सोचा,
    मै भी कवि बन जाउं

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्दर तारीफ के काबिल

    उत्तर देंहटाएं
  5. सिपिकाओं की धार
    नयी कविता पर मार
    शब्द रहे गौण
    अर्थ रहे मौन
    श्रेष्ठ रचनाकार
    हैं भला कौन ?

    अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  6. कल हलचल पर आपके पोस्ट की चर्चा है |कृपया अवश्य पधारें.....!!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया सीपियाँ. मोती भरे हैं इनमे

    उत्तर देंहटाएं
  8. अनमोल और सुंदर सीपियां.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  10. इन्हीं सीपियों ने अपने अंदर मोतियों को छुपाया है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. गद्य लिखता हूँ
    लाइनों को तोड़ कर
    कविता बन जाती है


    -यही हो रहा है आजकल...सो ही यहाँ भी हुआ...मगर मारक रहा!!

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत बढ़िया,अनमोल कविता

    उत्तर देंहटाएं
  13. गद्य लिखता हूँ
    लाइनों को तोड़ कर
    कविता बन जाती है........बढ़िया कही !!

    उत्तर देंहटाएं

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