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गुरुवार, 11 अगस्त 2011

"कोमल भावों की रचना हो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

तुम शब्दयुक्त हो छन्दमुक्त,
बहती हो निर्मल धारा सी।
तुम सरल-तरल अनुप्रासयुक्त,
हो रजत कणों की तारा सी।

आलेख पंक्तियाँ जोड़-तोड़कर
बन जाती हो गद्यगीत।
संयोग-वियोग, भक्ति रस से,
छलकाती हो तुम प्रीत-रीत।

उपवन में गन्ध तुम्हारी है,
कानन में है मृदुगान भरा।
लगती रजनी उजियारी सी,
सुख के सूरज से सजी धरा।

मेरे कोमल मन के नभ पर,
तुम अनायास छा जाती हो।
इतनी हो सुघड़-सलोनी सी,
सपनों में निशि-दिन आती हो।

तुम छन्द-काव्य से ओत-प्रोत,
कोमल भावों की रचना हो।
जिसमें अनुराग निहित मेरा,
वो सुरसवती सी रसना हो।

26 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत ही सुन्दर
    रचा है आप ने
    क्या कहने ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. आलेख पंक्तियाँ जोड़-तोड़कर
    बन जाती हो गद्यगीत।
    संयोग-वियोग, भक्ति रस से,
    छलकाती हो तुम प्रीत-रीत।
    उपवन में गन्ध तुम्हारी है,
    कानन में है मृदुगान भरा।
    लगती रजनी उजियारी सी,
    सुख के सूरज से सजी धरा।
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! आपकी इस लाजवाब रचना की तारीफ़ के लिए अल्फाज़ कम पड़ गए!

    उत्तर देंहटाएं
  3. तुम अनायास छा जाती है
    यहाँ शायद हो होना चाहिए |उसे ठीक कर लें |
    बहुत कोमल भावों की रचना है ..!!
    बहुत अच्छी लगी|
    बधाई एवं शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाकई कोमल भाव से सजी है यह गीत.... बहुत सुन्दर....

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही सुंदर और लाजवाब कविता
    धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं
  6. bahut pyara cover page hai.usse bhi sunder uski prashansa ka geet.bahut behtreen .badhaai.swatantrta divas ki bhi badhaai aaj hi de rahi hoon.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर भावो का समन्वय्।

    उत्तर देंहटाएं
  8. तुम शब्दयुक्त हो छन्दमुक्त,
    इस पहली पंक्ति में ही आपने सेंचुरी मार दी है।
    इसके बाद जो ताबड़तोड़ बैटिंग का मुजाहरा मिया है कि सेहवाग की बेस्ट इनिंग भी फ़ेल हो जाए।
    तुम सरल-तरल अनुप्रासयुक्त
    इसे पढ़कर जो छवि आंखों के सामने बनती है वह तो ऐसा दृश्य खींचता है कि आंखों से जाने का नाम नहीं लेता। आपने तो आज इन बिम्बों को नया अर्थ दिया है उसका बाखान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  9. उपवन में गन्ध तुम्हारी है,
    कानन में है मृदुगान भरा।
    लगती रजनी उजियारी सी,
    सुख के सूरज से सजी धरा।...

    इतनी सुन्दर रचना आप ही लिख सकते हैं !

    .

    उत्तर देंहटाएं
  10. इतनी हो सुघड़-सलोनी सी,
    सपनों में निशि-दिन आती हो
    ...
    bahut khoob

    उत्तर देंहटाएं
  11. jab kvita itni sunder hai to poora sangrah lazvab hoga hi

    kavy sangrah ke prkaashn par bdhaai

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत ही सुन्दर ... इतनी सुन्दर भावयुक्त रचना आप ही लिख सकते हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  13. सार्थक संदेश देती रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  14. तुम शब्दयुक्त हो छन्दमुक्त,
    बहती हो निर्मल धारा सी।
    तुम सरल-तरल अनुप्रासयुक्त,
    हो रजत कणों की तारा सी।
    रसमयी धार का अमृत प्रवाह यूँ ही वेगवान रहे ,कामना है हमारी .....शुक्रिया सर ./

    उत्तर देंहटाएं
  15. सुंदर कविता है और पैग़ाम भी बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  16. वाह बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति...आभार सहित...

    उत्तर देंहटाएं
  17. वाह!वाकई लाजबाव गीत है.....
    ---पर छन्दमुक्त....तो कोई कविता हो ही नहीं सकती...हाँ मुक्तछंद हो सकती है
    --और ये 'सुरसवती'---क्या है यह समझ नहीं आया..?

    उत्तर देंहटाएं
  18. अच्छे रस वाली को सुरसवती कहते हैं जो आपकी समझ में नहीं आयेगी ढॉ. श्याम गुप्त जी।

    उत्तर देंहटाएं
  19. ----श्रीमान जी , रसवती ही काफी है ...क्या कोई कुरसवती भी होती है ...रस आनंद का प्रतीक है .. ...सु या कु नहीं होता .. रसानंद , सुरसानंद नहीं...अशास्त्रीय बात वास्तव में मेरी समझ में नहीं आती....

    उत्तर देंहटाएं

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