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मंगलवार, 16 अगस्त 2011

"गीत-...हितैषी न मिला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



हमने देखे हैं बहुत दोस्त और दुश्मन भी,
किन्तु काँटों से बड़ा कोई पड़ोसी न मिला।
दूर घाटी में चहकते हुए इन फूलों को,
संग और साथ निभाने को हितैषी न मिला।।

बन्द पलकों में सजे स्वप्न चाँद-तारों के,
जब खुली आँख हुए दूर भ्रम नज़ारों के,
अज़नबी शहर में कोई भी स्वदेशी न मिला।
संग और साथ निभाने को हितैषी न मिला।।

टेढ़ी-मेड़ी थी डगर, ज़िन्दगी की मंजिल की,
देख तूफान को बढ़ जाती थी धड़कन दिल की,
सिर छिपाने को, कहीं द्वार-दरेशी न मिला।
संग और साथ निभाने को हितैषी न मिला।।

हर मुहल्ले, गली-चौराहे और बस्ती में,
लोग मशग़ूल दिखे, हमको बुतपरस्ती में,
जो करम हम पे करे, ऐसा उवैसी न मिला।
संग और साथ निभाने को हितैषी न मिला।।


20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही लिखा है आपने -
    हमने देखे हैं बहुत दोस्त और दुश्मन भी,
    किन्तु काँटों से बड़ा कोई पड़ोसी न मिला

    उत्तर देंहटाएं
  2. टेढ़ी-मेड़ी थी डगर, ज़िन्दगी की मंजिल की,
    देख तूफान को बढ़ जाती थी धड़कन दिल की,

    वाह सर ।

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. सटीक तथ्यों की अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर अभिव्यक्ति.... कहते हैं..
    दोस्त बन बन के मिले, मुझे मिटाने वाले
    मैंने देखे है कई रंग बदलने वाले....

    उत्तर देंहटाएं
  5. हर मुहल्ले, गली-चौराहे और बस्ती में,
    लोग मशग़ूल दिखे, हमको बुतपरस्ती में,
    जो करम हम पे करे, ऐसा उवैसी न मिला।
    संग और साथ निभाने को हितैषी न मिला।।
    सबका यही हाल है सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  6. जिसे चाहो वो कहां मिलता है?...मेरे ही एक शेर पर ग़ौर फ़रमाएं-
    मैंने चाहा है बहुत जिसको जान-वो-दिल की तरह, बस वही दूर हुआ जा रहा मंजिल की तरह।
    अथवा-
    कभी किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता...
    इसी मे संतोष करना पड़ेगा ज़नाब!...बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  7. सरलता से व्यक्त की गयी गहरी अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जब खुली आँख दूर हुए भ्रम नजारों के ...
    काँटों से बड़ा कोई पडोसी ना मिला !
    बेहतरीन !

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेहद ख़ूबसूरत और सटीक लिखा है आपने! लाजवाब रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  10. हर मुहल्ले, गली-चौराहे और बस्ती में,
    लोग मशग़ूल दिखे, हमको बुतपरस्ती में,
    जो करम हम पे करे, ऐसा उवैसी न मिला।
    संग और साथ निभाने को हितैषी न मिला।।इसीलिए लिए तो कहा गया -
    रफीकों से रकीब अच्छे जो जलके नाम लेतें हैं ,
    गुलों से खार बेहतर हैं जो दामन थाम लेतें हैं .


    . August 16, 2011
    उठो नौजवानों सोने के दिन गए ......http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
    सोमवार, १५ अगस्त २०११
    संविधान जिन्होनें पढ़ लिया है (दूसरी किश्त ).
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    मंगलवार, १६ अगस्त २०११
    त्रि -मूर्ती से तीन सवाल .

    उत्तर देंहटाएं
  11. " sahi kaha hai aapne ..ye rachana ne dil jeet liye .."


    http://eksacchai.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  12. सिर छिपाने को, कहीं द्वार-दरेशी न मिला।
    संग और साथ निभाने को हितैषी न मिला।।

    sundar bhaav

    उत्तर देंहटाएं
  13. खूबसूरत अभिव्यक्ति...आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  14. मेरे प्यारे वतन, जग से न्यारे वतन।
    मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।

    अपने पावों को रुकने न दूँगा कहीं,
    मैं तिरंगे को झुकने न दूँगा कहीं,
    तुझपे कुर्बान कर दूँगा मैं जानो तन।
    मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।

    अच्छे भाव
    सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  15. साम-दाम औ’ दण्ड की, हुई करारी हार।
    सत्याग्रह के सामने, डाल दिये हथियार।४।
    गंभीर प्रभाव छोडते , निपुण दोहे सुंदर बन पड़े हैं , साधुवाद सर ../

    उत्तर देंहटाएं

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