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रविवार, 14 अगस्त 2011

"ढोंग और आडम्बर क्यों" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

पहले था इन्सान मगर
अब बना हुआ है बन्दर क्यों?
कुंठा और द्वेष पनपा है,
अब मानव के अन्दर क्यों?

पर्वत से ढो करके नदियाँ,
मृदुजल को ले आती हैं,
बंजर धरती को अमृत से,
सिंचित करती जाती है,
लेकिन वो मीठा जल पा कर,
खारा बना समन्दर क्यों?

खुद को बड़ा बताने से,
क्या ऊँट बड़ा हो जाता है,
पास पहाड़ों के आने से,
राज़ सामने आता है,
अपने बिल में घुस कर चूहा,
बनता बहुत सिकन्दर क्यों?

सूप सदा खामोश रहे,
छलनी करती है शोर सदा,
चाँद घमण्डी की ही पिटती ,
किस्मत में अपमान बदा,
गुण औ' ज्ञान देन दाता की,
ढोंग और आडम्बर क्यों?

19 टिप्‍पणियां:

  1. यही ढोंग और ढकोसले आज हमारे दीन ईमान और चरित्र को खा रहे हैं लेकिन हम फिर भी सही रास्ता पकड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।
    आप एक सच्चे साहित्यकार का धर्म ख़ूब निभा रहे हैं।
    ऐसे साहित्यकार को वास्तव में साहित्यकार कहा जा सकता है।
    शुक्रिया !

    http://pyarimaan.blogspot.com/2011/08/blog-post.html

    जवाब देंहटाएं
  2. आज कोई भी ढोंग v aadambar ke bina nahi jeeta .badhiya post .आभार

    जवाब देंहटाएं
  3. सही सवाल उठाती पंक्तियाँ.

    जवाब देंहटाएं
  4. इसके अलावा रह ही क्या गया है अब?

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  5. खुद को बड़ा बताने से,
    क्या ऊँट बड़ा हो जाता है,
    पास पहाड़ों के आने से,
    राज़ सामने आता है,
    अपने बिल में घुस कर चूहा,
    बनता बहुत सिकन्दर क्यों?
    ये तो prani matr के sahaj swabhav में ही shamil है kutta भी अपने ghar में sher बनता है और बाहर bheegi billi.ये aadambar तो आज dunia की aaavshyakta see ban गयी है. सार्थक प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  6. सही प्रश्न उठाया है सर।
    ----------
    कल 15/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  7. यह ढोंग और पाखंड ही तो 1100 वर्षों तक देश को गुलाम बनाए रहा और आज भी यह गुलाम प्रवृति लोग अपना का गौरान्वित महसूस कर रहे हैं। कविता प्रेरक एवं अनुकरणीय है।

    जवाब देंहटाएं
  8. सटीक और गहरा कटाक्ष किया है परिस्थितियों पर।

    जवाब देंहटाएं
  9. सही है दादा अब एक हफ़्ते तक आपकी कलम रूकनी नही चाहिये वरना मै झगड़ा करने आउंगा खाल खींच दो अब देर नही

    जवाब देंहटाएं
  10. sahi kaha dr.saheb dhong ne hi to humen janwar se aadami banaya hai

    जवाब देंहटाएं
  11. सदियों से चली आ रही परंपरा को भला कौन ...तोड़ेगा...?

    anu

    जवाब देंहटाएं
  12. यथार्थ को बताती हुई सार्थक रचना /बहुत सही ढंग से लिखा है आपने /चित्र भी रचना के अनुसार लगाया है आपने /बधाई आपको /
    ब्लोगर्स मीट वीकली (४)के मंच पर आपका स्वागत है आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/आभार/

    जवाब देंहटाएं

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