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शनिवार, 3 सितंबर 2011

"शासन को चलाती है सुरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


शराब पर रचना की माँग की थी!
उनकी फरमाइश पर उन्हीं को समर्पित है यह रचना!
 ज़िन्दगी को आज खाती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

उदर में जब पड़ गई दो घूँट हाला,
प्रेयसी लगनी लगी हर एक बाला,
जानवर जैसा बनाती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

ध्यान जनता का हटाने के लिए,
नस्ल को पागल बनाने के लिए,
आज शासन को चलाती है सुरा,
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

आज मयखाने सजे हर गाँव में,
खोलती सरकार है हर ठाँव में,
सभ्यता पर ज़ुल्म ढाती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

इस भयानक खेल में वो मस्त हैं,
इसलिए भोले नशेमन त्रस्त हैं,
हर कदम पर अब सताती है सुरा।
मौत के पैगाम को लाती सुरा।।

सोमरस के दो कसैले घूँट पी,
तोड़ कर अपनी नकेले ऊँट भी,
नाच नंगा अब नचाती है सुरा।
मौत के पैगाम को लाती सुरा।।

डस रहे हैं देश काले नाग अब,
कोकिला का रूप" भऱकर काग अब,
गान गाता आज नाती बेसुरा।
मौत के पैगाम को लाती सुरा।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. डस रहे हैं देश काले नाग अब,
    कोकिला का “रूप" भऱकर काग अब,
    गान गाता आज नाती बेसुरा।
    मौत के पैगाम को लाती सुरा।।
    vah ji vah
    keya bat hai
    likane ka andaj hai aap may bahut hi kub hai

    उत्तर देंहटाएं
  2. सोमरस के दो कसैले घूँट पी,
    तोड़ कर अपनी नकेले ऊँट भी,
    नाच नंगा अब नचाती है सुरा।
    मौत के पैगाम को लाती सुरा।।

    waah behtreen najm

    उत्तर देंहटाएं




  3. आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी
    प्रणाम !
    सादर वंदेमातरम् !

    डस रहे हैं देश काले नाग अब,
    कोकिला का “रूप" भऱकर काग अब,
    गान गाता आज नाती बेसुरा।

    आप हमेशा ही कमाल लिखते हैं … आज भी बेहतर है

    आज शासन को चलाती है सुरा,
    मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

    आज मयखाने सजे हर गांव में,
    खोलती सरकार है हर ठांव में,


    …और अब सरकार अपनी आय के श्रोत बढ़ाने के लिए वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दे रही है …
    जिसको जो काला कारनामा करना है , करो । बस , सरकार साहिब के हिस्से का जमा करवा कर परमिट ले लो … और जो चाहो करो ।

    # अब भी इस सरकार को नहीं बदला तो फिर अवसर नहीं आएगा !!


    आपको सपरिवार
    बीते हुए हर पर्व-त्यौंहार सहित
    आने वाले सभी उत्सवों-मंगलदिवसों के लिए
    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  4. नाच नंगा अब नचाती है सुरा।
    मौत के पैगाम को लाती सुरा।।
    आप से से सहमत !
    .बहुत सुन्दर..

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज मयखाने सजे हर गाँव में,
    खोलती सरकार है हर ठाँव में,
    सभ्यता पर ज़ुल्म ढाती है सुरा।
    मौत का पैगाम लाती है सुरा।
    श्री मान जी आप ने सही कहा आज के नौजवानों को शराब बर्बाद ही तो कर रही है ..

    उत्तर देंहटाएं
  6. शराब आदमी को आदमी नहीं रखती...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ख़ूबसूरत और सारगर्भित प्रस्तुति...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  8. नाच नंगा अब नचाती है सुरा।
    मौत के पैगाम को लाती सुरा।।

    आपकी यह रचना लाजवाब है।
    नशा बर्बादी की जड़ है।

    मुसलमानों पर ऐतराज़ के चक्कर में नशे की हिमायत ?

    उत्तर देंहटाएं
  9. शास्त्री जी नमस्कार..
    सही संदेश ..मौत का पैगाम ,लाती है सुरा..

    'गज़ल' सुननें को शिरकत करें !

    उत्तर देंहटाएं
  10. आज शासन को चलाती है सुरा। अजी यह क्‍या लिख दिया? दिल्‍ली में पेशी पड़ जाएगी।

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||

    बोतलों का नाच-नंगा, न नजर आता कभी

    हाथ धो बदनाम के पीछे पड़े शायर सभी

    जाम में होता नशा तो नाचती बोतल दिखे

    है सरासर झूठ नादाँ , न नशा दारू चखे

    बोतले कुछ यूँ पड़ी थी, houson के सामने

    देखने भर से नशे में, सर लगे सर थामने

    शायरों की सोच को झटका लगा जो एक दिन

    बोतलें खाली लिए वे, झूमते माशूक बिन

    मन गई होली-दीवाली दूर बीयर-बार से

    चूम कर के बोतलों को, दूर रह के यार से

    बोतलों की शक्ल ही, असली नशा उत्तेजना

    चौक-चौबारे में चुस्की, मौज कर मस्ती मना ||


    aur LEADERS Lutate rahen ||

    उत्तर देंहटाएं
  12. kamaal ka likha hai shastri ji.har vishya par likhne me aap mahir hain.

    उत्तर देंहटाएं
  13. आदरनीय शास्त्री जी मानव को अपना दास बनाकर बर्बाद करने वाली सुरा पर आपकी रचना बहुरत अच्छी है.इस विषय पर जागरण जंक्शन पर मेरा आलेख शराब आपको पीती है,जो मैंने कुछ समय पूर्व लिखा था कृपया पढ़ें.ये पोस्ट १.७.२००११ को प्रकाशित हुई थी.(यदि रूचि हो तो)

    उत्तर देंहटाएं

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