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सोमवार, 26 सितंबर 2011

"ग़ज़ल-नई बोतल बदलते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 
वही साक़ी वही मय है, नई बोतल बदलते हैं
सुराखानों में दारू के नशीले जाम ढलते हैं

कोई गम को भुलाता है, कोई मस्ती को पाता है,
तभी तो शाम होते ही, यहाँ अरमां निकलते हैं

नहीं है तन-बदन का होश, बूढ़े और जवानों को
ख़ुमारी के नशे में तो, सभी के मन मचलते हैं

न अपनी कार भाती है, न बीबी याद आती है
किराये की सवारी में, मज़े करने को चलते हैं

हकीकत मानकर कोई, लुटाता रूप पर दौलत
सलोने स्वप्न पल-प्रतिपल, खुली आँखों में पलते हैं

18 टिप्‍पणियां:

  1. न अपनी कार भाती है, न बीबी याद आती है
    किराये की सवारी में, मज़े करने को चलते है ||


    @ जिन्दगी के प्रति ..गहरी बात कहें दी है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर रचना... बहुत ही सुन्दर भाव...

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह वाह बहुत ही सुन्दर भावमयी रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बधाई ||
    खूबसूरत प्रस्तुति ||

    उत्तर देंहटाएं
  5. kya baat hai aaj to aapne bahut khaas vishay par likha hai.bahut laajabaab likha hai.peene vaalon ko bahana chahiye....ek sher arj hai...
    maine unka peena chudaya apni kasam dekar.
    doston ne fir se pila di meri kasam dekar.

    उत्तर देंहटाएं
  6. न अपनी कार भाती है, न बीबी याद आती है
    किराये की सवारी में, मज़े करने को चलते हैं

    ...बहुत खूब !

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह! बहुत सुन्दर शास्त्री जी.
    आपके उत्कृष्ट भावों को नमन

    उत्तर देंहटाएं
  8. एकदम नए अंदाज़ में कमाल की ग़ज़ल।

    उत्तर देंहटाएं
  9. हकीकत मानकर कोई, लुटाता “रूप” पर दौलत
    सलोने स्वप्न पल-प्रतिपल, खुली आँखों में पलते हैं

    बहुत ही गहरी बात.

    उत्तर देंहटाएं
  10. ये बदला बदला अंदाज भी अच्छा है.

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुन्दर रचना... बहुत ही सुन्दर भाव...

    उत्तर देंहटाएं

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