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रविवार, 11 सितंबर 2011

"पाँच मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पाँच मुक्तक
जानते हैं सच तभी तो मौन हैं वो,
और ज्यादा क्या कहें हम कौन हैं वो।
जो हमारे दिल में रहते थे हमेशा-
हरकतों से हो गए अब गौण हैं वो।१।

दिल तो सूखा कुआँ नहीं होता,
बिन लिखे मजमुआँ नहीं होता।
लोग पल-पल की ख़बर रखते हैं-
आग के बिन धुँआ नहीं होता।२।

उनकी सौगात बहुत दूर गई,
लगता है बात बहुत दूर गई।
रौशनी होगी नहीं तारों से-
चाँदनी रात बहुत दूर गई।३।

कोई आया था हौसले भरने,
कोई आया था चोंचले करने।
कोई आया था खास मक़सद से-
कोई आया था फासले करने।४।

इतनी मजबूत राह थी पाई,
एक बरसात में बनी खाई।
दोष क्यों दे रहे हो लहरों को-
जब किनारे हुए हैं हरजाई।५।

25 टिप्‍पणियां:

  1. आप तो हर एक फन में माहिर हैं शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  2. दिल तो सूखा कुआँ नहीं होता,
    बिन लिखे मजमुआँ नहीं होता।
    लोग पल-पल की ख़बर रखते हैं-
    आग के बिन धुँआ नहीं होता।
    shandar muktak

    उत्तर देंहटाएं
  3. बड़ी गहरी बात है।
    (कुछ भूमिका में उस शख्स के बारे में भी बता देते। हम तो नहीं?)

    उत्तर देंहटाएं
  4. जानते हैं सच तभी तो मौन हैं वो,
    और ज्यादा क्या कहें हम कौन हैं वो।
    जो हमारे दिल में रहते थे हमेशा-
    हरकतों से हो गए अब गौण हैं वो।१।


    Good .

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रत्येक मुक्तक एक से बढ़ कर एक.जीवन के यथार्थ छिपे हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक से बढ़ कर एक ||

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
    आपको बहुत बहुत बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  7. आ. शास्त्री जी हर मुक्तक अपने आप में सम्पूर्ण अभिव्यक्ति है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आप तो हर एक फन में माहिर हैं शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  9. आप तो माहिर हैं शास्त्री जी.

    SACH .

    http://hbfint.blogspot.com/2011/09/8.html

    उत्तर देंहटाएं
  10. वैसे चारों मुक्तक बढ़िया हैं ..........लगता है कोई खलिश है जो जा जाकर वापस दस्तक दे जाती है

    शास्त्री जी बता दीजिये कौन है वो .......देखिये सभी पूछ रहे हैं

    उत्तर देंहटाएं
  11. कोई आया था हौसले भरने,
    कोई आया था चोंचले करने।
    कोई आया था खास मक़सद से-
    कोई आया था फासले करने।

    waah bentreen sabhi muktak

    उत्तर देंहटाएं
  12. मित्रों!
    आप लोग मुझसे सच उगलवाने का इतना आग्रह कर रहे हैं तो बता ही देता हूँ।
    --
    कल अपनी प्रिय शिष्या से बहुत दिनों के बाद लम्बी चैटिंग हुई और ये मुक्तक बन गए।
    --
    एक बात और-
    मेरे और मेरी शिष्या वन्दना गुप्ता से मेरे मतभेद हुए थे लेकिन कभी भी मन भेद नहीं हुआ और अब तो सब मतभेद भी समाप्त हो गये गए हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  13. हा हा हा ......देखा मैं यही कह रही थी बता देना चाहिए सबको .........आखिर पता तो चले कि ये उपज आखिर है कहाँ की .....वैसे मैं समझ तो गयी थी और चाहती तो बता देती मगर सोचा आपका ब्लॉग है आप ही बताएं तभी अच्छा लगेगा.

    उत्तर देंहटाएं
  14. इतनी मजबूत राह थी पाई,
    एक बरसात में बनी खाई।
    दोष क्यों दे रहे हो लहरों को-
    जब किनारे हुए हैं हरजाई।५।
    वाकई बहुत खूब सर लाजवाब....
    समय मिले आपको कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर
    आपका स्वागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  15. दोष क्यों दे रहे हो लहरों को-
    जब किनारे हुए हैं हरजाई....

    उत्तम मुक्तक हैं सर... संदेशात्मक...
    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत बढ़िया शास्त्री जी | आपको प्रणाम|

    मेरे ब्लॉग में भी पधारें |
    **मेरी कविता**

    उत्तर देंहटाएं
  17. जानते हैं सच तभी तो मौन हैं वो,
    और ज्यादा क्या कहें हम कौन हैं वो।
    जो हमारे दिल में रहते थे हमेशा-
    हरकतों से हो गए अब गौण हैं वो।१।सभी मुक्तक सुन्दर लेकिन इसका ज़वाब नहीं .दिल के बहुत करीब हैं वो ,पीठ किये बैठा चित चोर है वो ,.http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/2011/09/blog-post_13.हटमल
    अफवाह फैलाना नहीं है वकील का काम .

    उत्तर देंहटाएं
  18. एक से बढ़कर एक हैं सारे मुक्तक ..........बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं

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