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मंगलवार, 27 सितंबर 2011

"हमें लड़ना नहीं आता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बहुत अरमान हैं दिल में, हमें गढ़ना नहीं आता
पहाड़ों की कठिन मंजिल, हमें चढ़ना नहीं आता

सितारे टिमटिमाते हैं, मगर है चाँदनी गायब
अन्धेरे में सही पथ पर, हमें बढ़ना नहीं आता

हमारी ताक में दुश्मन, छिपे बैठे हैं झुरमुट में
बिना हथियार के उनसे, हमें लड़ना नहीं आता

समझती ही नहीं है अब नजर, नजरों की भाषा को
हमें लिखना नहीं आता, उन्हें पढ़ना नहीं आता

फटे ढोलक के ताले हैं, सुरों का रूप ओझल है
नई सी खाल तबले पर, हमें मढ़ना नहीं आता

26 टिप्‍पणियां:

  1. जो नज़रों की भाषा समझ लेते हैं उन्हें और क्या चाहिए... बहुत सुन्दर...

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  2. हमें लिखना नहीं आता, उन्हें पढ़ना नहीं आता
    आजकल् एक नये ‘रूप’ से परिचय हो रहा है,
    जो अच्छा है, वो अच्छा है,
    इसके आगे हमें गढ़ना नहीं आता।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर ! बेहतरीन प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. गज़ब की प्रस्तुति है…………सभी एक से बढकर एक हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह - वाह क्‍या खूब कहा है आपने ...बहुत ही बढि़या ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. 'हमारी ताक में दुश्मन, छिपे बैठे हैं झुरमुट में
    बिना हथियार के उनसे, हमें लड़ना नहीं आता'
    - यहाँ तो दुश्मन घर में ही बैठे हैं ,लड़ना तो बाद की बात ,समझना भी नहीं आता!

    उत्तर देंहटाएं
  7. फिर भी कोई मुगालता ना पाले, जब अपनी पर हम आते हैं तो बुलंदियां पैरों तले होती हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत लाजवाब और बेहद रोचक...

    उत्तर देंहटाएं
  9. समझती ही नहीं है अब नजर, नजरों की भाषा को
    हमें लिखना नहीं आता, उन्हें पढ़ना नहीं आता|

    प्यार से भरपूर शिकायत ....!
    शुभकामनाएँ!

    एक नज़र इधर भी

    उत्तर देंहटाएं
  10. बेहतरीन, साहित्यिक आनन्द का प्रवाह।

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुन्दर ! बेहतरीन प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  12. waah bahut sundar....hame likhna nahi aata aur unhe padhna nahi aata...

    उत्तर देंहटाएं
  13. समझती ही नहीं है अब नजर, नजरों की भाषा को
    हमें लिखना नहीं आता, उन्हें पढ़ना नहीं आता

    फटे ढोलक के ताले हैं, सुरों का “रूप” ओझल है
    नई सी खाल तबले पर, हमें मढ़ना नहीं आता

    वाह !!! बहुत ही अलग अंदाज .

    सबकुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी.....
    सच है दुनियाँ वालों कि हम हैं अनाड़ी.

    उत्तर देंहटाएं
  14. क्या बात है सर ..... हमें लड़ना नहीं आता ..काश ऐसा हो जाता ... प्रीत रहती बैर चला जाता ...खुबसूरत रचना ... शुक्रिया जी /

    उत्तर देंहटाएं
  15. प्रेम ही को मन बसाते हैं
    क्‍योंकि हमें लड़ना नहीं आता।

    उत्तर देंहटाएं
  16. समझती ही नहीं है अब नजर, नजरों की भाषा को हमें लिखना नहीं आता, उन्हें पढ़ना नहीं आता kya gazab ka likhe hain......wah.

    उत्तर देंहटाएं
  17. शक्ति-स्वरूपा माँ आपमें स्वयं अवस्थित हों .शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  18. समझती ही नहीं है अब नजर, नजरों की भाषा को
    हमें लिखना नहीं आता, उन्हें पढ़ना नहीं आता!
    shandar

    उत्तर देंहटाएं

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