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शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

"दोहे-झूठा श्रृद्धा प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जीवित माता-पिता को, पुत्र रहे दुत्कार।  
पितृपक्ष में उमड़ता, झूठा श्रृद्धा प्यार।१।

जनसेवक करने लगे, जनता का आखेट।
घोटाले करके भरें, मोटे अपने पेट।२।

भूल गये कर्तव्य को, याद रहा अधिकार।
सत्याग्रह सच्चे करें, राज करें मक्कार।३।

प्रजातन्त्र परिवेश में, पोषित भ्रष्टाचार।
गद्दारों के सामने, शासन है लाचार।४।
नेता रहते ठाठ से, मरते हैं निर्दोष।
पहन केंचुली दया की, गिना रहे गुण-दोष।५।

31 टिप्‍पणियां:

  1. मयंक जी नमस्कार । सुन्दर दोहे । मुझे ए लाइने अच्छी लगी। आपका मेरे ब्लाग पर स्वागत है। नेता रहते ठाठ से, मरते हैं निर्दोष
    पहन केंचुली दया की, गिना रहे गुण-दोष

    उत्तर देंहटाएं
  2. भावयुक्‍त रचना।
    सच में अपने माता पिता के साथ ठीक व्‍यवहार न करने वाले पितृ पक्ष में दुनिया भर के कर्मकांड करते हैं।
    गहरा कटाक्ष।

    उत्तर देंहटाएं
  3. कपूत


    राज अधिकारी


    भ्रष्टाचार


    और नेता ||


    मौज में--



    दिल है की



    सुधरने का नाम



    ही नहीं लेता ||


    बेबस आम जनता |

    क्या करे --

    बस ऐसे ही मरे |


    आभार ||

    उत्तर देंहटाएं
  4. जीवित माता-पिता को, पुत्र रहे दुत्कार।
    पितृपक्ष में उमड़ता, झूठा श्रृद्धा प्यार।१
    सबसे दुखद यह ही है.
    प्रभावी दोहे.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही खुबसूरत और भावमय कविता ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. जीवित माता-पिता को, पुत्र रहे दुत्कार।
    पितृपक्ष में उमड़ता, झूठा श्रृद्धा प्यार।१।

    सही बात कही है सर!

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  7. मयंकजी,
    सबका तो नहीं, पर यह ड़र है कुछेकों का जो अपने किए हुए कुकृत्यों को जानते हुए अपने अनिष्ट के भय से यह कर्मकांड़ करते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जीवित माता-पिता को पुत्र रहे दुत्कार
    पित्र पक्ष में उमड़ता झूठा श्रद्धा प्यार ...
    वाह!! असल बात तो यही है।
    शानदार पोस्ट....

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपके दोहे तो सत्सैय्या के दोहे जैसे मार कर रहे हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुन्दर और सटीक दोहे...

    उत्तर देंहटाएं
  11. घाव करें गंभीर...ये आपक़े दोहे...

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी-पुरानी हलचल पर 24-9-11 शनिवार को ...कृपया अनुग्रह स्वीकारें ... ज़रूर पधारें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएं ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  13. भूल गये कर्तव्य को, याद रहा अधिकार...
    सर्वत्र यही दिख पड़ता है!

    उत्तर देंहटाएं
  14. जीवित माता-पिता को पुत्र रहे दुत्कार
    पित्र पक्ष में उमड़ता झूठा श्रद्धा प्यार ...
    शास्त्री जी नमस्कार ।
    वाह!बहुत गहरी चोट की है आपने ! आशा है की यही भावना आगे की रचनाओं में भी जारी रहेगा !

    उत्तर देंहटाएं
  15. gagar men sagar bhar diye hain aap, dohon ko padhkar aisa hi laga.

    उत्तर देंहटाएं
  16. मयंक जी नमस्कार । सुन्दर दोहे ।

    उत्तर देंहटाएं
  17. जीवित माता - पिता को , पुत्र रहे दुत्कार ।
    पितृपक्ष में उमड़ता , झुठा श्रृद्धा प्यार ।
    आदरणीय शास्त्री जी नमस्कार ।
    पैदा होता है धर्म मरकर बनता है सम्प्रदाय । यही स्थिति आज हमारे समाज की हो गयी है । हम पितृपक्ष के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर लकीर के फकीर बन गये है । हम अपने जीवित माता - पिता के साथ तो ठीक से व्यवहार करते है नहीं , और उनके मरने पर पितृपक्ष में तरह - तरह के लोक दिखावटी कर्मकांड करते है ।
    बहुत सुन्दर और कटाक्षपूर्ण कविता ...... आभार ।

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  18. bahut sateek aur laajabab dohe.na jaane mujhse kaise choot gaye the aaj hi facebook se pata chala.

    उत्तर देंहटाएं

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