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बुधवार, 7 सितंबर 2011

"चाँदनी ही हमें सुहाती है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



 हर घड़ी उनकी याद आती है
क्यों मुहब्बत हमें सताती है

चैन छीना, करार छीना है,
रात आँखों में गुज़र जाती है

अब अकेले सफर नहीं कटता
कोई मंजिल नज़र न आती है

ईद अपनी न सूनी रह जाए
साल भर में घड़ी ये आती है

रूप चन्दा का बहुत प्यारा है
चाँदनी ही हमें सुहाती है

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर विरह का गीत है, यह गज़ल मेरे भी दिल को छू गई!

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  2. ्वाह आज तो बहुत ही मोहक अन्दाज़ है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. चैन छीना, करार छीना है,
    रात आँखों में गुज़र जाती है

    अब अकेले सफर नहीं कटता
    कोई मंजिल नज़र न आती है

    waah behtree najm ......

    उत्तर देंहटाएं
  4. स्वप्निल भावों की मोहक प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  5. श्रृंगार के वियोग पक्ष पर बहुत सुन्दर रचना शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  6. अब अकेले सफर नहीं कटता
    कोई मंजिल नज़र न आती है
    क्या बात है शास्त्री जी मायूसी झलक रही है ?

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह , यह एक बिलकुल अलग अंदाज़ की ग़ज़ल है .
    लगता है कोई किशोर कह रहा है अपने मन की बात .

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत ही बेहतरीन रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम

    उत्तर देंहटाएं
  9. चांदनी के आगे तो चंदा पानी भरे।

    उत्तर देंहटाएं
  10. ये विरह का गीत भी लाजवाब है शास्त्री जी ... नमस्कार ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह !!!!!!!!!
    क्या कहूँ,
    पढकर मज़ा आ गया ||

    उत्तर देंहटाएं

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