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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

"दीपक जलते जाएँगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

नेह अगर होगा खुश होकर दीपक जलते जाएँगे।
धरती पर फैला सारा अँधियारा हरते जाएँगे।।

सुमन-सुमन से मिलकर, जब घर-आँगन में मुस्काएँगे,
सूनी-वीरानी बगिया में, फिर से गुल खिल जाएँगे,
फड़-फड़ करती तितली, भँवरे गुंजन करते आयेंगे।
धरती पर फैला सारा अँधियारा हरते जाएँगे।।

दीपक-बाती स्नेह स्नेहभरी जब, लौ उजास की उगलेगी,
देवताओं का वन्दन होगा, धूप सुगन्धित सुलगेगी,
जननी-जन्मभूमि का हम आराधन करते जाएँगे।
धरती पर फैला सारा अँधियारा हरते जाएँगे।।

महफिल में शम्मा होगी तो, सुर की धारा निकलेगी,
विरह सुखद संयोग बनेगा, जमी पीर सब पिघलेगी.
उर के सारे जख़्म पुराने, प्रतिपल भरते जाएँगे।
धरती पर फैला सारा अँधियारा हरते जाएँगे।।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

"आमन्त्रण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सम्मानित चिट्ठाकार वन्धुओं,
जैसा की आप सभी को विदित है की आगामी ३० अप्रैल को हिंदी भवन, विष्णु दिगंबर मार्ग, नयी दिल्ली में हिंदी ब्लॉग जगत का वहु प्रतीक्षित परिकल्पना सम्मान-२०१० का महत्वपूर्ण आयोजन है,साथ ही इस अवसर पर हिंदी चिट्ठाकारिता से संदर्भित एक वृहद् और वहु आयामी पुस्तक (हिंदी ब्लॉगिंग : अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति)का लोकार्पण भी सुनिश्चित है, परिकल्पना समूह की नयी त्रैमासिक पत्रिका वटवृक्ष तथा मेरा नया उपन्यास ताकि बचा रहे लोकतंत्र का भी लोकार्पण होना है .......पहली बार इस महा आयोजन में समाज के प्रत्येक क्षेत्र के विशिष्ट अतिथियों का समागम हो रहा है .....
परिकल्पना परिवार की और से यह खुला आमंत्रण हिंदी के समस्त चिट्ठाकारों के लिए है...किन्तु दिल्ली के आसपास के ब्लॉगर गण के लिए विशेष है क्योंकि दिन है शनिवार और दूसरे दिन भी अवकाश , इसलिए कोई बहाना नहीं ....आप भी आईये और अपने परिजनों को भी साथ लाईये .....आप आयेंगे तो आयोजन से जुड़े समस्त सदस्यों का उत्साह वर्द्धन होगा !
कार्यक्रम से संवंधित विशेष जानकारी निम्नवत है :

इस कार्यक्रम में विमर्श,परिचर्चाएँ एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र होंगे। पूरे कार्यक्रम का जीवंत प्रसारण इंटरनेट के माध्यम से पूरे विश्व में किया जाएगा। आप इस कार्यक्रम का आनंद अपने इंटरनेट भी उस दिन ले पायेंगे। जिसकी रिकार्डिंग बाद में भी नेट पर ही मौजूद रहेगी। इंटरनेट पर उपस्थिति को भी आपकी मौजूदगी माना जायेगा। पर यह गिनती दिल्‍ली-एनसीआर और देश से बाहर वालों के लिए ही लागू होगी। कार्यक्रम का विवरण निम्नवत हैः
दिन व समयःशनिवार 30 अप्रैल 2011, दोपहर 3 बजे से रात्रि‍ 8.30 बजे तक। रात्रि‍ 8 .30 बजे भोजन। स्थानःहिंदी भवन , विष्‍णु दिगम्‍बर मार्ग, नई दिल्ली-110002

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

'बदनाम' शायर की एक ग़ज़ल (प्रस्तोता-डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

"ग़ज़ल"

वो शम्मा मोहब्बत की, जला कर चले गये।
एक याद मेरे दिल में, बसा कर चले गये।।

बुझती नहीं है आग, लगायी जो सनम ने,
यादों की पालकी में, बिठा कर चले गये।।

वो इश्क के वादों में, कसम प्यार की खाकर,
दामन को अपने हमसे, छुड़ा कर चले गये।।

खुशियाँ थी बेशुमार, जब वो पास थे मेरे,
वो शम्मा आरजू की, बुझा कर चले गये।।

अपनी तो जफा याद है, उनकी न वफा न याद,
घर को मेरे ‘बदनाम’, बनाकर चले गये।।
गुरू सहाय भटनागर "बदनाम"

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

"शिथिलतन-यवा मन की कविता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों! आज एक पुरानी डायरी मेरे हाथ लग गई!
उसमें बहुत समय पहले की मेरी यह रचना लिखी हुई थी!
मुझे तो पसन्द नहीं आई, शायद आपको भी पसन्द न आये!
स्वर्गलोक से चलकर बाला,
मेरे पास चली आई।
उसकी चंचल-मादक मूरत,
थी मेरे मन को भी भाई।।

हँस-हँस कर वो स्वप्नसुन्दरी,
मुझसे बातें करती थी।
बहुत प्यार से आलिंगन कर,
बाँहों में वो भरती थी।।

मेरा भी मन मचल रहा था,
उसका आँचल पाने को।
उर में लड्डू फूट रहे थे,
अपना उसे बनाने को।।

चंचल अँखियों को मटकाना,
मुझको बहुत रिझाता था।
यह लगता था मेरा उससे,
जन्म-जन्म का नाता था।।

तभी एक सादी सी महिला,
आई करने को व्यवधान।
मुझको दर्पण दिखलाकर,
बोली-रे नर! हो सावधान।।

देख रंग में भंग, अप्सरा ने-
दिखलाया रूप विकट।
लहु को पीने को बड़े दाँत,
उसके मुख में हो गये प्रकट।।

देख भयानक दृश्य अचानक,
निद्रा से मैं जाग गया।
वृद्धावस्था में यौवन का,
शैतान निशाचर भाग गया।।

सपनों में कभी तुम्हारे जब,
रूपसी-भूतनी आ जाए।
निद्रा-तन्द्रा में बरबस ही,
यह दृश्य दृगों में छा जाए।।

मुखड़ा निस्तेज देख लेना,
दर्पण में एक बार अपना।
हो जाएगा आभास तभी,
यह सच था या केवल सपना।।

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

"ककड़ी मोह रही सबका मन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

लम्बी-लम्बी हरी मुलायम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
कुछ होती हल्के रंगों की,
कुछ होती हैं बहुरंगी सी,
कुछ होती हैं सीधी सच्ची,
कुछ तिरछी हैं बेढंगी सी,
ककड़ी खाने से हो जाता,
शीतल-शीतल मन का उपवन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
नदी किनारे पालेजों में,
ककड़ी लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव में, फड़-ठेलों पर,
यह रोगों को दूर भगाती,
यह मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
आता है जब मई महीना,
गर्म-गर्म जब लू चलती हैं,
तापमान दिन का बढ़ जाता,
गर्मी से धरती जलती है,
ऐसे मौसम में सबका ही,
ककड़ी खाने को करता मन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

"मिट्टी से है बनी सुराही" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



 सुराही
पानी को ठण्डा रखती है,
मिट्टी से है बनी सुराही।
बिजली के बिन चलती जाती,
देशी फ्रिज होती सुखदायी।।

छोटी-बड़ी और दरम्यानी,
सजी हुई हैं सड़क किनारे।
शीतल जल यदि पीना चाहो,
ले जाओ सस्ते में प्यारे।।

इसमें भरा हुआ सादा जल,
अमृत जैसा गुणकारी है।
प्यास सभी की हर लेता है,
निकट न आती बीमारी है।।

अगर कभी बाहर हो जाना,
साथ सुराही लेकर जाना।
घर में भी औ' दफ्तर में भी,
इसके जल से प्यास बुझाना।। 

रविवार, 24 अप्रैल 2011

"देखो कितने सारे आम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


झूमर जैसे लटक रहे हैं,
देखो कितने सारे आम।
मुँह में पानी भर आता है,
देख-देखकर प्यारे आम।
कच्ची-कच्ची सी ये अमिया,
सबका जी ललचाती हैं।
खट्टी-खट्टी प्यारी अमिया,
सबको बहुत लुभाती हैं।
पेड़ों पर अमियों के गुच्छे,
बल खाते लहराते हैं
इन्हें तोड़ने सारे बच्चे,
बगिया में आ जाते हैं।।
काट-छीलकर, नमक मिला कर,
चटनी बनती है बढ़िया।
खातीं है चटकारे लेकर,
यह चटनी बुढ़िया-गुड़िया।

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

"गर्मी को तुम दूर भगाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



कल तक रुत थी बहुत सुहानी।
अब गर्मी पर चढ़ी जवानी।।
चलतीं कितनी गर्म हवाएँ।
कैसे लू से बदन बचाएँ?
नीबू-पानी को अपनाओ।
लौकी, परबल-खीरा खाओ।।
खरबूजा-तरबूज मँगाओ।
फ्रिज में ठण्डा करके खाओ।।
गाढ़ा करके दूध जमाओ।
घर में आइसक्रीम बनाओ।।
कड़ी धूप को कभी न झेलो।
भरी दुपहरी में मत खेलो।
ताजे-शीतल जल से न्हाओ।
गर्मी को तुम दूर भगाओ।।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

"चार दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


पनप रहा है आजकल, जन-गण में व्यभिचार।
नीचे से ऊपर तलक, फैला भ्रष्टाचार।।
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प्रजातन्त्र से है दुखी, जनता सारी आज।
रिश्वत बिना न आजकल, बनता कोई काज।।
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मत की ताकत से बना, निर्धन भी धनवान।
सत्ता सुख में लिप्त हो, बन बैठा शैतान।।
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जनता के सौजन्य से, सिंहासन को पाय।
पाँच साल तक शान से, आँखे रहा दिखाय।।

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