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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

“मन का गीत रचें हम कैसे?” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

धधक रही है ज्वाला, मुल्ला-पण्डित के उपदेशों में।
मन का गीत रचें हम कैसे, हिंसा के परिवेशों में।।

मूँग दल रही है दानवता, मानवता के सीने पर,
जालिम झूठ लगाता पहरा, भोले सच के जीने पर,
दहक रहा बनकर अंगारा, उग्रवाद सन्देशों में।
मन का गीत रचें हम कैसे, हिंसा के परिवेशों में।।

शूलों से सीखो कोमल फूलों की रखवाली करना,
सूरज से सीखो चन्दा में धवल चाँदनी को भरना,
अपमानित हो रहा निरन्तर, अपना खून विदेशों में।
मन का गीत रचें हम कैसे, हिंसा के परिवेशों में।।

क्या खाये और क्या पी लें अब, दूध-दही हैं जहर भरे,
बैंगन, लौकी, मटर, करेला, फल-फूलों में जहर भरे,
बेच रहे घटिया स्वदेश में, बढ़िया है परदेशों में।
मन का गीत रचें हम कैसे, हिंसा के परिवेशों में।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. आज के हालत पर और मिलावटी सामानों पर बहुत खूबसूरती से लिखा है....सुन्दर कविता....

    उत्तर देंहटाएं
  2. मूँग दल रही है दानवता, मानवता के सीने पर,
    जालिम झूठ लगाता पहरा, भोले सच के जीने पर,
    दहक रहा बनकर अंगारा, उग्रवाद सन्देशों में।
    मन का गीत रचें हम कैसे, हिंसा के परिवेशों में।।
    कतई गलत नहीं लिखा आपने.. सुन्दर शब्दों में बांधा..
    जय हिंद.... जय बुंदेलखंड...

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह मार्ग बहुत पथरीला है
    जीवन कितना जहरीला है
    सामयिक और अत्यंत सुन्दर गीत

    उत्तर देंहटाएं
  4. मन का गीत रचें हम कैसे, हिंसा के परिवेशों में।nice

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्या खाये और क्या पी लें अब, दूध-दही हैं जहर भरे,
    बैंगन, लौकी, मटर, करेला, फल-फूलों में जहर भरे,
    बेच रहे घटिया स्वदेश में, बढ़िया है परदेशों में।
    मन का गीत रचें हम कैसे, हिंसा के परिवेशों में।

    बिलकुल सच कहा आपने..... सुंदर कविता....

    उत्तर देंहटाएं
  6. मन का गीत रचें हम कैसे, हिंसा के परिवेशों में।।
    उफ़! अभी पूरी रचना नहीं पढी है। पर यह एक पंक्ति हज़ार पर भारी है। क्योंकि मानसिक हिंसा के शिकार तो हम हर पल हो रहे हैं। और लगा कि ये पंक्ति मेरे दिल की आवाज़ है इस लिये पहले अपने उद्गार प्रकट कर दूँ फिर पूरी रचना पढूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. असाधारण शक्ति का पद्य, बुनावट की सरलता और रेखाचित्रनुमा वक्तव्य सयास बांध लेते हैं, कुतूहल पैदा करते हैं। कवि का सत्य से साक्षात्कार दिलचस्प है जिसका जरिया उसके आक्रोश के रूप में हाजिर है। रचना दृष्टि की व्यापकता के चलते हर वर्ग में लोकप्रिय होगी। साधुवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  8. aaj to apne desh mein hi apna khoon apmanit ho raha hai phir kya desh aur kya videsh..............bahut hi sundar chitran kiya hai aaj ke halaton ka.

    उत्तर देंहटाएं

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