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रविवार, 7 फ़रवरी 2010

“मुक्त होना चाहता हूँ।” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

अब नही मैं दासता का भार ढोना चाहता हूँ।
बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।

काटने को फसल सुख की जुड़ गये वो,
दुःख आया तो पलट कर मुड़ गये वो,
सभ्यता के नगर में आबाद होना चाहता हूँ।
बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।

जो तुम्हारे मन में आये, वो करो तुम,
फूल तज कर शूल से उल्फत करो तुम,
कैद को मैं छोड़कर, आजाद होना चाहता हूँ।
बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।

राह हैं सीधी-सरल, पर हो गये दिल तंग है,
स्वार्थ की परमार्थ से, होती सदा ही जंग है,
आँसुओं से सींचकर मैं प्यार बोना चाहता हूँ।
बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. काटने को फसल सुख की जुड़ गये वो,
    दुःख आया तो पलट कर मुड़ गये वो,
    सभ्यता के नगर में आबाद होना चाहता हूँ।
    बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।

    बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ..... बहुत सुंदर रचना....

    आभार,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  2. राह हैं सीधी-सरल, पर हो गये दिल तंग है,
    स्वार्थ की परमार्थ से, होती सदा ही जंग है,
    आँसुओं से सींचकर मैं प्यार बोना चाहता हूँ।
    बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।

    बंधनों से मुक्त होने की तडप शब्दों में साफ़ झलक रही है.....काश स्वार्थ और परमार्थ की जंग खत्म हो जाये तो हर जगह प्यार ही प्यार हो....खूबसूरत अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  3. हमारे बन्धनों से तो कभी दूर नहीं हो सकते.

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर भाव और लाजवाब प्रस्तुति, शुभकामनाएं.

    रामराम

    उत्तर देंहटाएं
  5. अब नही मैं दासता का भार ढोना चाहता हूँ।
    बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।

    बहुत खूब शास्त्री जी . मैं भी यही चाहता हूँ

    उत्तर देंहटाएं
  6. अब नही मैं दासता का भार ढोना चाहता हूँ। nice

    उत्तर देंहटाएं
  7. सभ्यता के नगर में आबाद होना चाहता हूँ।

    बहुत ही सुंदर पंक्ति है ये तो...

    उत्तर देंहटाएं
  8. काटने को फसल सुख की जुड़ गये वो,
    दुःख आया तो पलट कर मुड़ गये वो,
    सभ्यता के नगर में आबाद होना चाहता हूँ।
    बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।

    bahut hi sundar panktiyan aur utne hi sundar bhav.

    उत्तर देंहटाएं
  9. राह हैं सीधी-सरल, पर हो गये दिल तंग है,
    स्वार्थ की परमार्थ से, होती सदा ही जंग है,
    आँसुओं से सींचकर मैं प्यार बोना चाहता हूँ।
    बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।
    Bahut gahare bhav ...Aabhar!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. कल 12/अगस्त/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  11. राह हैं सीधी-सरल, पर हो गये दिल तंग है,
    स्वार्थ की परमार्थ से, होती सदा ही जंग है,
    आँसुओं से सींचकर मैं प्यार बोना चाहता हूँ।
    बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।
    बहुत सुन्दर
    अनुभूति : ईश्वर कौन है ?मोक्ष क्या है ?क्या पुनर्जन्म होता है ?
    मेघ आया देर से ......

    उत्तर देंहटाएं
  12. .आँसुओं से सींचकर मैं प्यार बोना चाहता हूँ।
    बन्धनों से मैं तुम्हारे मुक्त होना चाहता हूँ।।

    लाजवाब

    उत्तर देंहटाएं

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