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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

"जुगाड़ों से चलने लगी जिन्दगी है!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

*संशोधित

कहीं है ज्वार और भाटा कहीं है,
कहीं है सुमन और काँटा कहीं है,
करीने से सजने लगी गन्दगी है!
जवानी में थकने लगी जिन्दगी है!!
जुगाड़ों से चलने लगी जिन्दगी है!!!

कहीं है अन्धेरा कहीं चाँदनी है,
कहीं शोक की धुन कहीं रागनी है,
मगर गुम हुई गीत से नगमगी है!
जवानी में थकने लगी जिन्दगी है!!
जुगाड़ों से चलने लगी जिन्दगी है!!!

दरिन्दों की चक्की में, घुन पिस रहे हैं,
चन्दन को बगुले भगत घिस रहे हैं,
दिलों में इबादत नही तिश्नगी है!
जवानी में थकने लगी जिन्दगी है!!
जुगाड़ों से चलने लगी जिन्दगी है!!!

धरा रो रही है, गगन रो रहा है,
अमन बेचकर आदमी सो रहा है,
सहमती-सिसकती हुई बन्दगी है!
जवानी में थकने लगी जिन्दगी है!!

जुगाड़ों से चलने लगी जिन्दगी है!!!

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

5 COMMENTS:

संगीता पुरी, २ फरवरी २०१० ४:१६ PM

धरा रो रही है, गगन रो रहा है,
अमन बेचकर आदमी सो रहा है,
सहमती-सिसकती हुई बन्दगी है!
यौवन में थकने लगी जिन्दगी है!!
क्‍या खूब लिखा आपने !!

Suman, २ फरवरी २०१० ४:४२ PM

कहीं ज्वार है और भाटा कहीं है,
कहीं है सुमन और काँटा कहीं है,
यौवन में थकने लगी जिन्दगी है! nice

पी.सी.गोदियाल, २ फरवरी २०१० ४:५४ PM

दरिन्दों की चक्की में, घुन पिस रहे हैं,
चन्दन को बगुले भगत घिस रहे हैं,
दिलों में इबादत नही तिश्नगी है!
यौवन में थकने लगी जिन्दगी है!!

बहुत सुन्दर, मगर क्या कोई क्रान्ति के लिए उठेगा, सवाल यह भी है ?

अमिताभ श्रीवास्तव, २ फरवरी २०१० ५:३९ PM

bahut badhiya rachna he ji.
kintu AMAN bech kar koi kese so saktaa he? isaka javaab bhi he aapne upar ki panktiyo me kuchh is tarah de diya ki-दरिन्दों की चक्की में, घुन पिस रहे हैं,
चन्दन को बगुले भगत घिस रहे हैं.
ye bagule bhagat hi so sakte he...
lazavab


19 टिप्‍पणियां:

  1. शास्त्री जी प्रणाम, कविताओ में खास रूचि नहीं है. लेकिन जिंदगी और जुगाड़ का जिक्र देखा तो पढने का मन किया. भाव विभोर कर देने वाली रचना. मेरी बधाई स्वीकार करे.
    www.gooftgu.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. मानवीय त्रासदी के सफल चित्रण की नई परिभाषा गढ़ती है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. करीने से सजने लगी गन्दगी है! शास्त्री जी इस एक ही पंक्ति के अनेक अर्थ हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूब और बहुत सुंदर लिखा आपने....


    नोट: लखनऊ से बाहर होने की वजह से .... काफी दिनों तक नहीं आ पाया ....माफ़ी चाहता हूँ....

    उत्तर देंहटाएं
  5. करीने से सजने लगी गन्दगी है!
    जवानी में थकने लगी जिन्दगी है!!

    -बहुत ही सुन्दर, शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह बहुत खूब लिखा है आपने! इस ख़ूबसूरत और सच्चाई को दर्शाती हुई शानदार रचना के लिए बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  7. दरिन्दों की चक्की में, घुन पिस रहे हैं,
    चन्दन को बगुले भगत घिस रहे हैं,
    दिलों में इबादत नही तिश्नगी है!
    जवानी में थकने लगी जिन्दगी है!!
    जुगाड़ों से चलने लगी जिन्दगी है!!!

    वाह........क्या कहूँ.........बहुत बहुत सुन्दर....कठोर यथार्थ को आपने ऐसे चित्रित किया है कि वह ह्रदय बेध जाती है...

    बहुत ही सुन्दर रचना...वाह.

    उत्तर देंहटाएं
  8. कड़्वा सच बयां किया है आपने ।
    बहुत खूब..।
    आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. धरा रो रही है, गगन रो रहा है,
    अमन बेचकर आदमी सो रहा है,
    सहमती-सिसकती हुई बन्दगी है!
    जवानी में थकने लगी जिन्दगी है!!
    जुगाड़ों से चलने लगी जिन्दगी है!!!

    behad sundar prastuti aaj ke halat ko prastut kar diya.

    उत्तर देंहटाएं
  10. यथार्थ को तीखेपन के साथ प्रस्तुत करती सुन्दर रचना के लिए साधुवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  11. जुगाड़ों से चलने लगी जिन्दगी है ...

    जीवन की हक़ीकत खोल दी आपने ............ बहुत कमाल का लिखा है शास्त्री जी .........

    उत्तर देंहटाएं
  12. सब से पहले जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें रचना हमेशा की तरह बहुत अच्छी लगी धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं

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