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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

“दिलों में उल्फतें कम हैं!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

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वही चौपाल-चौबारे,
वही गलियाँ, वही द्वारे,
मगर इन्सान बेदम हैं!
दिलों में उल्फतें कम हैं!!

वही गुलशन वही कलियाँ,
वही फूलों भरी डलियाँ,
घटी खुशियाँ, बढ़े ग़म हैं!
दिलों में उल्फतें कम हैं!!

हँसी झूठी, कमर टूटी,
लबों पर बेबसी फूटी,
नज़ारों की नज़र नम है!
दिलों में उल्फतें कम हैं!!

वही पत्ते, वही डाली,
वही भोजन, वही थाली,
वही वो हैं वही हम हैं!
दिलों में उल्फतें कम हैं!!

11 टिप्‍पणियां:

  1. पाठकों को शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. दिलों में उल्फतें कम हैं!
    अब सोचना यह है कि इन्हें कैसे बढ़ाया जाए!
    --
    "महाशिवरात्रि पर आपके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ!"

    --
    कह रहीं बालियाँ गेहूँ की - "मेरे लिए,
    नवसुर में कोयल गाता है - मीठा-मीठा-मीठा!"
    --
    संपादक : सरस पायस

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर शीर्षक के साथ..... बहुत सुंदर रचना.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. ulfat badh sakti hai,agar prem ka koi ek hi din na ho..har din prem divas ho :)

    उत्तर देंहटाएं
  5. घटी खुशियाँ, बढ़े ग़म हैं!
    दिलों में उल्फतें कम हैं!!
    सुन्दर पंक्तियाँ और भाव

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर कविता, आप को भी शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
  7. हँसी झूठी, कमर टूटी,
    लबों पर बेबसी फूटी,
    नज़ारों की नज़र नम है!
    दिलों में उल्फतें कम हैं!!

    sach kah diya.........aur sab yahan hain bas pya rhi na jaane kahan kho gaya hai.

    उत्तर देंहटाएं

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