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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

“बरफी-लड्डू के चित्र देखकर, अपने मन को बहलाते हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

1806mawa248 
मधुमेह हुआ जबसे हमको, 
मिष्ठान नही हम खाते हैं।
बरफी-लड्डू के चित्र देखकर,
अपने मन को बहलाते हैं।। 
Dal_Bhat_Tarkari,Nepal
आलू, चावल और रसगुल्ले,
खाने को मन ललचाता है,
हम जीभ फिराकर होठों पर,
आँखों को स्वाद चखाते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।।
IMG_0887
गुड़ की डेली मुख में रखकर,
हम रोज रात को सोते थे,
बीते जीवन के वो लम्हें,
बचपन की याद दिलाते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।

हर सामग्री का जीवन में,
कोटा निर्धारित होता है,
उपभोग किया ज्यादा खाकर,
अब जीवन भर पछताते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।

थोड़ा-थोड़ा खाते रहते तो,
जीवन भर खा सकते थे,
पेड़ा और बालूशाही को,
हम देख-देख ललचाते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।

हमने खाया मन-तन भरके,
अब शिक्षा जग को देते हैं,
खाना मीठा पर कम खाना,
हम दुनिया को समझाते हैं।
मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मिष्ठान नही हम खाते हैं।

(कुछ चित्र गूगल सर्च से साभार)

19 टिप्‍पणियां:

  1. अजी,
    अपना ध्यान तो कविता के शब्दों पर तो रहा जैसा रहा, लार टपकवाती मिठाइयों से नहीं हटा.

    उत्तर देंहटाएं
  2. शाश्त्रीजी आप क्यों हमारा जी जलाकर मजे ले रहे हैं?:)

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. दिल की बात या यूँ कहूँ दिल का दर्द कविता में !

    उत्तर देंहटाएं
  4. शास्त्री जी ... इतने सजीव चित्र हैं की लार टपक रही है .... और रचना का हास्य भी क्‍माल का है ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. कम उम्रवाले तो आपकी इस रचना से सीख ले सकते हैं !!

    उत्तर देंहटाएं
  6. युं देख-देख जी ललचाता है।
    बस मीठा ही मीठा भाता है।
    जब से हुआ है मधुमेह प्रमेह
    जीवन नीरस हुआ जाता है।

    अपने राशन की शक्कर का
    कोटा अब तो बंद हुआ है।
    जो खाते थे बेतोल मिठाई
    उसका खाना मंद हुआ है।

    बार त्योंहार खाने का मन हो
    डॉक्टर का सुईया याद आता है
    इंसुलिन ना लेनी पड़ जाए कहीं
    युं सो्च-सोच जिया घबराता है

    शास्त्री जी-आज इतना ही
    जय हिंद

    उत्तर देंहटाएं
  7. सर जी! ये बिलकुल भी अच्छा नहीं कर रहे हैं आप...मतलब होली पर इस तरह से हम लाचारों को प्रताड़ित करना क्या ठीक है ? वो आपकी पिछली पोस्ट किसी तरह देख कर भाग लिए अब फिर से इतने सुन्दर चित्र और कविता...आखिर कब तक कोई मूंह में पानी भरे घूमेगा...

    उत्तर देंहटाएं
  8. वक्त के साथ सही सन्देश देती रचना है पर इन चित्रों का क्या किया जाये जो ये सब खाने पर उकसा रहे हैं....आप तो संयम रख लेंगे पर बाकी सबका क्या होगा.....

    होली की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  9. यह तो बड़ी गड़बड़ हो गयी. चलिये इन सब चीजों का स्वाद आपको पहुंचे.

    उत्तर देंहटाएं
  10. उफ़! मुँह में पानी आ गया है.... अब मुझे आपके घर आना ही पड़ेगा.... पर मैं मीठे का बहुत शौक़ीन हूँ... बहुत सुंदर पोस्ट.... हाथों से भी लार टपक पड़ी है....

    उत्तर देंहटाएं
  11. अजी हमारे यहां तो यह चित्र भी नही दिखते, चलिये आज अप ने सब याद दिला दिये, ओर सच कहुं लार तो हमारी भी टपकने लगी है जी

    उत्तर देंहटाएं
  12. बिना खटीमा जाये तो अब हिन्दुस्तान ट्रिप होने से रही..इतना ललचा दिया है आपने. :)

    उत्तर देंहटाएं
  13. Waah! waah...apani majburi bhi hasyaras me itani khubsurati se bayaan kari ....shiksha to sach kamaal ki hai lekin paani to aa hi gaya aab kya kije!!
    Sadar

    उत्तर देंहटाएं
  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  15. सबका यही हाल होना है


    आपको व आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं

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